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ISSN 2292-9754

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10.27.2014


चौथा खंभा

पिछले दो सालों से लगातार भटकने के बाद आखिर उसे महानगर के नामी टी.वी. न्यूज़ चैनल में संवाददाता की नौकरी मिल गई। उसके पिता एक गरीब किसान थे। उन्होंने उसे अपना खून-पसीना एक करके पढ़ाया ताकि कोई टिकाऊ नौकरी करे और अपनी दोनों छोटी बहनों की शादी के लिए पैसा जोड़े। उसने भी अपने पिता की लाज रखी और प्रथम श्रेणी से हिन्दी पत्रकारिता में स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

मीडिया की नौकरी करने का उसका एक अन्य कारण भी था। लोकतंत्र के इस चौथे खंभे में उसकी गहरी आस्था थी, उसे विश्वास था कि मीडिया ही है जो गरीब और वंचित लोगों की आवाज़ को शासन-प्रशासन के कानों में डालता है। अपनी पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान ही उसने संकल्प किया था कि वह भी अपने पिछड़े गाँव की बदहाली की तस्वीर एक न एक दिन अवश्य मीडिया में देगा। उसके गाँववासी सालों से बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं, जहाँ स्कूल के नाम पर एक जर्जर-सी इमारत, बिना दवा-डॉक्टर की डिस्पेंसरी और बिना बिजली के खंभे इसके गवाह हैं।

उसे बहुत अंचभा हुआ कि न्यूज़ चैनल में होते हुए भी उसे एंटरटेनमेंट की बीट थमा दी गई। उसका काम बस फिल्मी सितारों और सेलेब्रेटिज़ की पार्टियों की कतरनें बटोरना था और उनके इंटरव्यू पर मसाला लगाकर ब्रेकिंग न्यूज़ बनाना था। उसे कुछ ही महीनों में सब कुछ समझ में आ गया। बाज़ार की ताकत के सामने जनहित मुद्दों के नाम पर की जा रही निरर्थक चर्चा की हक़ीक़त वह बख़ूबी जान चुका था। अपने चैनल की एंकरों की हिन्दी सुनकर उसका मन क्रोध से भर जाता और अपनी प्रतिभा का हनन होते देख उसके आँसू निकल आते।

उस दिन ज़ोरों की बारिश हो रही थी और उसकी तबियत भी ठीक नहीं थी, लेकिन उसका जाना ज़रूरी था। उसे एक नामी फिल्मी एक्टर के बंेटे के जन्मदिन की पार्टी कवर करनी थी। उसका जमीर उसे बार-बार धिक्कारता, लेकिन जब भी वह नौकरी छोड़ने का फैसला करता, उसके सामने दोनों छोटी बहनों का मासूम चेहरा आ जाता। उसने मन ही मन एक बार फिर अपने गाँववालों से माफी माँगी और भरे दिल से स्कूटर स्टार्ट कर निकल पड़ा।


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