अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
12.12.2008
 

मित्रता का धर्म
रमेश कुमार


एक महीना पहले ही इस छोटे से कस्बे के सरकारी अस्पताल में मेरा तबादला हुआ तो महानगर का जीवन छोड़कर यहाँ आना अच्छा नहीं लगा, पर क्या करता? सरकारी नौकरी में तो एक शहर से दूसरे शहर में जाना ही पड़ता है।

पर भला हो कंपाउन्डर राम भरोसे का, जिसने पहले ही दिन से मुझे बड़ा सहयोग दिया और मेरी ज़रूरतों का ख्याल रखा। रहने के लिए क्वाटर न मिलने तक मैं उसके ही घर पर ठहरा और उसके हाथ का बनाया खाना खाता रहा।

इस दौरान राम भरोसे नगर के प्रसिद्ध व्यक्तियों के बारे में मुझे बताता रहा। पर वह मास्टर इस्माइल की बहुत तारीफ़ करता था। मास्टर इस्माइल इस कस्बे की कई सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारी और अमन कमेटी के अध्यक्ष थे। हालांकि इस कस्बे में विभिन्न जातियों के लोग रहते थे, पर हिन्दू और मुसलमान परिवारों के घर अधिक थे। इनमें आपसी सद्‌भाव बनाए रखने और छोटे मोटे झगड़ों को निपटाने का काम अमन कमेटी करती थी। मास्टर इस्माइल के बारे में राम भरोसे द्वारा बार-बार ज़िक्र करने से उनका नाम मेरे जेहन में समा गया था।

एक महीने के बाद मुझे तीन कमरों का छोटा सा बंगला मिल गया। बच्चों की परीक्षा समाप्त होने के बाद ही वह अपनी माँ के साथ आ सकते थे, इसलिए मैं अकेला ही ज़रूरत का सामान लेकर बंगले में शिफ्ट हो रहा था। राम भरोसे मेरी मदद कर रहा था। बातों-बातों में फिर से मास्टर इस्माइल का ज़िक्र आया तो मैं पूछ बैठा, मास्टर इस्माइल अगर स्कूल में पढ़ाते नहीं हैं तो लोग उन्हें मास्टर इस्माइल क्यों कहते हैं? क्या अमन कमेटी का अध्यक्ष होने के कारण ही उन्हें मास्टर की उपाधि दे दी गई है?

नहीं सर! ऐसा नहीं है। मास्टर इस्माइल शाम चार बजे से अपनी हवेली में बच्चों को बुलाकर मुफ्त में ट्यूशन पढ़ाते हैं। उनकी मेहनत और सहयोग के कारण औसत दर्जे के बच्चे भी अच्छे नम्बरों से पास हो जाते हैं। हिन्दी, उर्दू और गणित विषयों में उनकी सचमुच मास्टरी है।

अच्छा? मैंने आश्चर्य व्यक्त किया।

इस नगर में असामाजिक तत्व भी हैं जो कई बार साम्प्रदायिक सद्‌भाव को समाप्त करके विवाद बढ़ाने की कोशिशें करते हैं, पर मास्टर इस्माइल सबका मुँह बंद कर देते हैं। उनकी तर्क शक्ति और सूझबूझ के कारण ही यहाँ पर कोई गड़बड़ नहीं हो पाती।

अगर ऐसा है तो बहुत अच्छी बात है। मैं भी मास्टर इस्माइल से मिलूँगा, मैंने कंपाउन्डर राम भरोसे को उत्तर दिया।

पर मेरा दुर्भाग्य यह था कि मैं चाहकर भी दो महीने मास्टर इस्माइल से मिलने उनकी हवेली पर न जा सका। सरकारी अस्पताल में प्रातः आठ बजे से दोपहर दो बजे तक मेरी ड्यूटी होती। अस्पताल मरीज़ों की भीड़ से खचाखच भर जाता। बुखार, पेट दर्द, खांसी, खट्टी डकारें, गले के दर्द वाले मरीज़ों के अलावा इमरजेंसी वाले मरीज़ों की भीड़ भी बढ़ जाती। इमरजेंसी में घायल मरीज़ आते जिन्हें किसी दुर्घटना अथवा झगड़े में चोट लगी होती। ऐसे मरीज़ों की चीख चिल्लाहट और कराहने की आवाज से वातावरण दर्दीला हो उठता। कमज़ोर हृदय का आदमी तो घायल का बहता खून भी नहीं देख सकता, पर मुझे डॉक्टर होने के नाते ऐसे मरीज़ के प्रति अपनी जिम्मेदारी और दयाभाव को कुछ अधिक बढ़ाना पड़ता। ऐसे वक्त पर राम भरोसे कंपाउन्डर का तजुर्बा भी काम आता। वार्ड ब्वाय और नर्स की मदद से ऐसे मरीज़ के घाव साफ करके राम भरोसे सीरिंज भरकर मुझे पकड़ा देता और मैं बहुत ही प्यार के साथ मरीज़ की चोट वाले स्थान पर इंजेक्शन लगाकर उस स्थान को सुन्न कर देता ताकि घाव साफ करते हुए मरीज़ को अधिक परेशानी ना हो।

इमरजेंसी में आने वाले किसी भी मरीज़ को मैं निराश नहीं करता था इसलिए मुझे अस्पताल में ही शाम के चार बज जाते। इसके बाद ही मैं घर जा पाता।

एक दिन मैं शाम के चार बजे सारा काम निपटा कर घर लौटने की तैयारी कर ही रहा था कि एक ऑटो रिक्शा में एक घायल व्यक्ति को लादकर कुछ लोग अस्पताल में आए। लगभग पैंतीस वर्ष का अधेड़ व्यक्ति, नाम संजय, जाति से ब्राह्मण, खून से सना, दो मंजिला मकान से नीचे पत्थरों पर गिर गया था। उसके साथ चार-पाँच लोग आए थे किन्तु थोड़ी देर बाद पच्चीसों लोगों की अस्पताल से बाहर भीड़ लग गई।

स्ट्रेचर पर लाद कर उसे फौरन ही ऑपरेशन थियेटर में भेजा गया। मैंने सर्जन डॉ. वी.एस. चौधरी को फोन करके बुला लिया। खून से लथपथ उसके शरीर को साफ करने से पता चला कि वह किस्मत का धनी था। इसलिए उसका सिर बच गया था किन्तु पाँव की हड्डियाँ टूट गई थीं। पेट में भारी जख्म बन गया था। कोई नुकीला पत्थर घुस कर एक-दो नसें काट चुका था। ठोड़ी और नाक पर मामूली जख्म थे। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि उसके शरीर से बहुत सारा खून बह गया था। उसके दो-तीन आपरेशन करने से पहले उसके लिए खून का प्रबंध करना बहुत ज़रूरी था।

मैंने उसके रिश्तेदारों के बारे में पूछताछ की तो पता चला कि वह एक मंदिर का पुजारी था। उसकी पत्नी और बच्चे गाँव गए हुए थे। मंदिर के अन्य सहायक और पड़ोस के रहने वाले लोग उसके साथ आए थे। मैंने उन्हें बताया कि संजय का खून ओ-पॉजिटिव ग्रुप का है। यदि संजय के लिए कोई तुरंत खून दे सके तो बड़ी राहत मिल जाएगी। मंदिर का कोई भी सहायक खून देने के लिए तैयार नहीं हुआ। तीनों व्यक्ति कहने लगे कि हमें तो डर लगता है। उन्हें समझाना व्यर्थ हुआ। साथ आए लोग कहने लगे कि हम लोग आपस में चंदा करके रुपयों का फंड एकत्र कर देते हैं। किसी प्राइवेट ब्लड बैंक से खून मँगा लिया जाए।

मुझे यह कार्य संभव नहीं लग रहा था क्योंकि पच्चीस किलोमीटर दूर बड़े महानगर में स्थित ब्लड बैंक से खून लाने में तीन-चार घंटे से अधिक समय लग जाता। मैं बड़ी कातर दृष्टि से लोगों से प्रार्थना करता रहा। आखिर पाँच-छः नौजवानों का दिल पसीजा। वह खून देने को तैयार हो गए। पर उनका खून टेस्ट करने के बाद पता चला कि उनमें से किसी का भी ब्लड संजय के खून से मेल न खाता था।

मैं निराश हो रहा था। हमारे सर्जन वी.एस. चौधरी भी आकर ऑपरेशन थियेटर में उपस्थित हो चुके थे। संजय की तड़प हम लोगों से देखी नहीं जा रही थी। अब इतना भी समय न था कि उसे किसी एम्बुलेंस में डालकर महानगर भेजा जा सके। लगता था कि खून के अभाव में वह जल्दी ही दम तोड़ देगा।

तभी अचानक एक व्यक्ति अपनी सधी हुई चाल से कमरे में घुसा। उसका रौबदार चेहरा इस समय कुछ उदास था। उसके पीछे तीन-चार लोग खड़े थे।

डॉक्टर साहब! आप मेरा खून मिलाकर देखें। मुझे पता है कि मेरा खून ओ-पॉजिटिव है। पर आप अपनी तसल्ली कर लें, उस व्यक्ति ने जिस अंदाज में यह वाक्य कहा, मैं समझ गया कि यह नगर के अन्य लोगों से बहुत ही अलग किस्म का कोई असाधारण व्यक्ति है।

डॉ. वी.एस. चौधरी के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई। इस मुस्कान में मुझे आशा की किरण लग रही थी। डॉ. चौधरी ने आगंतुक से बड़े सम्मानपूर्ण लहजे में कहा, आइए! मास्टर इस्माइल। अब आप आ गए हैं तो मरीज़ ज़रूर बच जाएगा।

मैं आश्चर्य से चौंका। तो क्या यही है मास्टर इस्माइल, जिसे कस्बे के लोग किसी देवदूत से कम नहीं मानते। लंबा सा कद, बड़ी बड़ी मूँछें, गोरा चेहरा, लंबे घुंघराले बाल, बेलबूटे वाली लंबी सी शेरवानी पहने हुए आकर्षक व्यक्तित्व के धनी, आवाज एकदम मीठी और जादूभरी।

मैंने मास्टर इस्माइल के खून का परीक्षण किया। संजय के खून से एकदम मिलता जुलता था। मास्टर इस्माइल का खून हम लोग लेने लगे। मास्टर इस्माइल ने पलंग पर लेटे हुए कहा, डॉक्टर साहब, आप मेरा खून चाहे जितना ले लीजिए, संजय की जान बच जानी चाहिए।

संजय, आपका मित्र है क्या? मेरे साथ खड़ी नर्स शीला ने पूछा?

वह सभी का मित्र है। इस कस्बे का नागरिक है। उसकी जान बचाना मेरा फ़र्ज़ है। घर में उसकी पत्नी और दो बच्चे हैं। उनका कोई सहारा नहीं है, इस्माइल ने जवाब दिया।

डॉ. वी.एस. चौधरी और हम सभी के प्रयासों से संजय के सारे ऑपरेशन सफल रहे। उसके प्राण बच गए। वह एक महीने से भी ज्यादा समय तक अस्पताल में भर्ती रहा। इसके बाद उसे छुट्टी दे दी गई।

इस मध्य मास्टर इस्माइल कभी कभी संजय को देखने के लिए अस्पताल आते रहे थे। उनसे मिलने का दौर जैसे-जैसे आगे बढ़ा मैं उनसे प्रभावित होता चला गया। मास्टर इस्माइल में कई तरह की खूबियाँ थीं। जैसे सबसे बड़ी खूबी तो यह थी कि वह एक नेक दिल और सच्चे इंसान थे। सभी के साथ मित्रता का व्यवहार करते थे। उन्हें गुस्सा होते या चीखते चिल्लाते किसी ने भी न देखा था।

मैं उस कस्बे के सरकारी अस्पताल में तीन वर्षों तक रहा। इसके बाद मेरा उस नगर से तबादला हो गया। मास्टर इस्माइल ने मुझे एवं मेरे परिवार के सदस्यों को इस अवसर पर अपनी हवेली में एक बिदाई पार्टी दी। इसमें नगर के अन्य लोगों को भी बुलाया। मेरी सेवाओं के लिए फूल का गुलदस्ता एवं अन्य उपहार दिए। मास्टर इस्माइल की पत्नी ने अपने हाथों से तैयार किए कुछ खास व्यंजन भी रात्रि भोज के दौरान हमें परोसे। वह बहुत ही स्वादिष्ट खाना था। वापसी की ट्रेन में बैठते हुए मुझे सचमुच ही इस नगर और मास्टर इस्माइल से बिछुड़ना अखर रहा था। मैं और मेरी पत्नी ने आपस में विचार किया कि रिटायरमेंट के बाद हम इसी नगर में आकर बस जाएँगे।

तबादले के पश्चात मैंने मास्टर इस्माइल को धन्यवाद का पत्र लिखा। उनका भी उत्तर आया। पर हम लोगों की कार्य व्यस्तता के चलते खतों-किताबत का यह सिलसिला आगे जारी न रह सका। मैं मरीज़ों की देखभाल और अपनी घर-गृहस्थी के कार्यों में उलझ गया।

देखते ही देखते हवा की तरह पंद्रह वर्ष कब गुज़र गए, पता ही न चला। मुझे दो-तीन प्रमोशन मिले और मैं सीनियर डॉक्टर्स की श्रेणी में आ गया। अचानक ही मुझे एक दिन राज्य सरकार का आदेश मिला कि मेरी पदोन्नति करके मुझे उसी कस्बे में पुनः भेजा जा रहा है, जहाँ मास्टर इस्माइल के कारण नगर की पहचान थी।

मेरी दिली खुशी का कोई ठिकाना न था। सोचा कि मास्टर इस्माइल को खत लिखकर अपने पहुँचने की सूचना दूँ, पर दूसरा विचार आया कि एकदम से मिलकर इस्माइल को अचंभित करना अधिक रोमाँचपूर्ण रहेगा। मेरी पत्नी मास्टर इस्माइल से मिलने के लिए मुझे से भी अधिक उत्साहित थी। कारण यह था कि हमारे दोनों पुत्र हमसे दूर थे। एक पुत्र तो अपनी नई नौकरी के साथ नई वैवाहिक ज़िंदगी की शुरूआत में मस्त था। दूसरा अपनी उच्च शिक्षा के सिलसिले में मुँबई में था। अतः पत्नी की इच्छा थी कि वह सामाजिक कार्यों में मास्टर इस्माइल को मदद करे। उसने यह निर्णय व्यस्तता के कारण लिया था।

मैं सीनियर सर्जन एवं अस्पताल प्रमुख के रूप में जब अस्पताल पहुँचा तो देखा कि नगर के रूपरंग की तरह अस्पताल की सज्जा एवं आकार में भी परिवर्तन हुआ है। जिस नगर की आबादी उस समय मात्र अस्सी हज़ार हुआ करती थी अब चार लाख से अधिक हो गई थी। अस्पताल का छोटा सा भवन तीन बड़ी इमारतों में बदल गया था। जब यहाँ पर डा. वी.एस. चौधरी इंचार्ज होते थे, मात्र तीन डॉक्टर थे। अब चौबीस डॉक्टर्स थे। इन सारे डॉक्टर्स और दो सौ कर्मचारियों का मैं सर्वोच्च अधिकारी था। कल्पना कर के रोमाँचित हो उठा। पर मुझे प्रशासन करने का अनुभव था, इसलिए इस तरह की चुनौतियों का सामना करना मुझे कोई कठिन कार्य भी नहीं लग रहा था। अस्पताल में सारे ही लोग नए थे।

मैं उन कर्मचारियों की भीड़ में राम भरोसे कंपाउन्डर को ढूँढ रहा था, ताकि मास्टर इस्माइल से मुलाकात तय कर सकूँ। कोई ज़रूरी नहीं था कि राम भरोसे कंपाउन्डर मुझे मिल ही जाता। शायद उसका भी तबादला हो गया हो।

मैं अपनी उत्सुकता को मन में दबाए हुए राम भरोसे कंपाउन्डर को तलाशता रहा। पर काफी ढूँढने पर वह नहीं मिला तो मैंने प्रशासनिक अधिकारी से राम भरोसे का रिकार्ड ढूँढकर लाने को कहा। पता चला कि राम भरोसे कंपाउन्डर तो नहीं, पर राम भरोसे लेबोरेटरी इंचार्ज ज़रूर उस अस्पताल में नौकरी पर था। वह आज छुट्टी पर था।

मेरे सारे उत्साह पर पानी फिर गया। मेरे लिए एक दिन काटना भी भारी पड़ रहा था। मैंने प्रशासनिक अधिकारी रामबाबू से पूछा, क्या आप इस नगर के मास्टर इस्माइल को जानते हो।

नहीं सर! मेरी पोस्टिंग यहाँ पर सिर्फ छः माह पहले ही हुई है। मैं इस नगर से भलीभाँति परिचित नहीं हूँ। हम घर की ज़रूरत का सामान अपनी कालोनी के एक ही दुकानदार से खरीद लेते हैं। कहीं आना-जाना होता ही नहीं, रामबाबू ने उत्तर दिया।

मैं क्या कहता। चुप हो गया। किसी तरह पूरा दिन और रात भी गुजारी। दूसरे दिन मैं स्वयं ही अस्पताल के लेबोरेटरी विभाग में चलकर गया। मेरा धड़कता हुआ दिल सारे रास्ते कहता रहा कि राम भरोसे लेबोरेटरी इंचार्ज वही व्यक्ति निकले जो मेरे नीचे कंपाउन्डर था।

जैसे ही मैं लेबोरेटरी में घुसा, मुझे कुर्सी पर पेन्ट-शर्ट और सर्फद कोट पहने एक अच्छे व्यक्तित्व वाला आदमी दिखाई दिया। मैं उसके पास गया तो लगा कि वह पुराना राम भरोसे ही था, हालाँकि उसकी शक्ल में काफी परिवर्तन हो चुका था। मैंने उसे संबोधित किया, राम भरोसे...!

मेरी आवाज़ उसके लिए चिरपरिचित थी। वह एकदम से कुर्सी से उठा और मेरे चरण स्पर्श करते हुए कहा, सर! आप? मेरे पास अचानक! हालाँकि आज शाम को कान्फ्रेंस हाल में सारे कर्मचारियों को आपके पास मिलने एवं परिचय के लिए आना ही है।

तुम्हारे और मेरे संबंध औपचारिकताओं वाले थोड़े ही हैं, राम भरोसे? तुम मेरे वही पुराने कंपाउन्डर हो। याद है हम दोनों मिलकर मरीज़ों के हाथों पर पट्टियाँ बाधा करते थे? मैं जोर से हँस पड़ा।

हँसी राम भरोसे को भी आई। पर उसकी आँखों में आँसू आ गए। बोला, सर, इतने बड़े अफसर होकर भी आप वैसे ही हैं, एकदम सहज। मुझ गरीब को आपने याद रखा। मैं तो आपका प्यार और स्नेह भूल ही नहीं सकता।

तुम अभी, इसी समय मेरे ऑफिस में आओ। वहीं पर बैठकर चाय पियेंगे। इसके बाद मुझे डॉक्टर्स की मीटिंग में जाना है, मैं लौट पड़ा।

अभी सहायक को काम समझाकर दस मिनट में आता हूँ, साहब! राम भरोसे का जवाब मेरे कानों में पीछे से सुनाई पड़ा।

थोड़ी ही देर में राम भरोसे मेरे शानदार दफ्तर में हाजिर था। मैंने घंटी बजाकर चपरासी को चाय लाने का आदेश दिया और राम भरोसे के कुर्सी पर बैठते ही पहला प्रश्न दागा, मास्टर इस्माइल के क्या हाल हैं? आज शाम को उनकी हवेली पर चलें?

सर! मास्टर इस्माइल को लोग अब भूल चुके हैं। वह गुज़रे ज़माने की चीज़ हो गए हैं। इन पंद्रह वर्षों में लगता है कि जैस सौ सालों का परिवर्तन हो गया हो। इस नगर में बड़ी-बड़ी इमारतें तो बन गईं, पर इनमें रहने वालों के दिल एकदम तंग और छोटे हो गए हैं।

राम भरोसे! तुम पहेलियाँ न बुझाओ। जो कहना है, साफ-साफ कहो।

वही कह रहा हूँ, सरकार। वह ज़माने लद गए जब लोग आपकी या मास्टर इस्माइल की दिल से कद्र करते थे। अब इस नगर में बहुत परिवर्तन आ गया है। भौतिकवादी लोग चाहत के फेर में नहीं पड़ते।

छोडो, दुनियाँ को! मास्टर इस्माइल कहाँ है, मैं लगभग चीख पड़ा। मेरा सब्र समाप्त हुआ जा रहा था।

तो सुनिए! मास्टर इस्माइल अब ज्यादा बूढ़े हो गए हैं। स्टेशन के सामने वाली धर्मशाला के दरवाज़े पर बैठे आपको भीख माँगते हुए मिल जाएँगे। लोग कहते हैं कि वह पागल हो गए हैं।

राम भरोसे की बात सुनकर मुझे झटका सा लगा। उनकी हवेली, पत्नी और पुत्र भी था, मेरे मुँह से निकला।

सर! उनकी हवेली दो संप्रदायों के दंगों में जला दी गई। उनकी पत्नी को दंगाइयों ने मार डाला। क्या आपने अखबारों में नहीं पढ़ा।

यह कब की बात है?

आज से पाँच साल पहले की।

तब तो मैं ब्रिटेन में था। ट्रेनिंग प्रोग्राम में एक वर्ष के लिए पत्नी के साथ गया था।

किन्तु इस नगर में तो कभी भी सांप्रदायिक दंगे नहीं होते थे। इस नगर की यही विशेषता थी, मैं आश्चर्य से बोल पड़ा था।

चपरासी दो कपों में चाय और बिस्किट का प्याला हमारे टेबल पर रख गया था। पर चाय ऐसे ही पड़ी रही। चपरासी पुनः केबिन में आया और बोला, सर! यहाँ के कुछ राजनीतिक नेता और सामाजिक कार्यकर्ता आपसे मिलना चाहते हैं।

बोलो, अभी नहीं मिल सकता। शाम सात बजे अस्पताल का सारा काम खत्म करके मिलूँगा, मैंने आदेश दिया।

जी सर! चपरासी बाहर चला गया। मैंने केबिन के बार दरवाजे पर लगा लाल बल्ब जला दिया। इसका अर्थ यह था कि अब केबिन में कोई नहीं आए।

राम भरोसे तुम अपनी बात ज़ारी रखो, मैंने राम भरोसे को आश्वस्त किया।

अब राम भरोसे इत्मीनान से कहने लगा, सर, आपको याद है... सत्रह साल पहले आपने संजय नाम के एक ब्राह्मण का उपचार करके उसे बचाया था। मास्टर इस्माइल ने उसे यदि अपना खून नहीं दिया होता तो वह नहीं बचता। संजय ने मास्टर इस्माइल का बहुत आभार माना था। इसके बाद दोनों के परिवारों में मित्रता हो गई थी। पाँच वर्ष पहले संजय की युवा पुत्री रश्मि इस्माइल के बेटे फहीम के साथ दिल्ली भाग गई। सुना है कि वहाँ पर दोनों ने विवाह कर लिया। दोनों के मध्य यह प्यार कई सालों से फल-फूल रहा था।

मास्ट इस्माइल और उनकी पत्नी को यह विवाह मंजूर था। पर संजय के जाति बिरादरी वाले और अन्य धर्म के ठेकेदारों ने इस विवाह में रोड़े अटकाए, वह कहते थे कि हिन्दु ब्राह्मण की बेटी मुसलमानों के घर जाकर सारा धर्म भ्रष्ट कर देगी। उधर मुल्ला-मौलवी कहते थे, काफ़िर की बेटी को पवित्र-पाक इस्लाम कबूल नहीं करेगा। पहले वह अपना नाम और धर्म बदलकर पाक हो जाए।

मास्टर इस्माइल और संजय के परिवार ने धर्म के ठेकेदारों की पंचायतों और महा पंचायतों में शामिल होकर उन्हें बहुत समझाया और प्रार्थना की कि जब दोनों परिवारों को कोई ऐतराज़ नहीं है तो समाज को आखिर क्यों शिकायत है? समाज दो परिवारों के सदस्यों का जीवन क्यों खराब करना चाहता है? समाज और पंचायतों की यह दादागिरी ठीक नहीं है! पर पाखंडी समाज के ठेकेदारों ने दोनों परिवारों की प्रार्थना पर गौर नहीं किया। आखिर विवादों से तंग आकर रश्मि और फहीम ने स्वयं ही गुप्त निर्णय लिया। दोनों इकट्ठे इस नगर से भाग गए।

धर्म के ठेकेदारों ने इसे संजय और इस्माइल के परिवारों की मिलीजुली साजिश समझा और अपने अपने हथियार लेकर दोनों परिवारों के घरों पर हमला कर दिया। संजय का परिवार तो घर छोड़कर भाग गया था। पर मास्टर इस्माइल ने घर छोड़कर भागना उचित नहीं समझा। दंगाइयों की भीड़ ने उस रात बड़ा कहर ढाया। मास्टर इस्माइल की पत्नी को कुल्हाड़ों से काटकर फेंक दिया। मास्टर इस्माइल को पेड़ से बाँधकर बेल्ट से पीटा। उनकी हवेली में पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी गई। इसी तरह संजय के मकान में भी आग लगा दी गई। सारी रात दोनों सम्प्रदायों के लोगों के मकानों पर हमले किए जाते रहे। इस तांडव नृत्य को पुलिस ने रोकने की भरसक कोशिश की। इसके बावजूद भी इस नगर के पन्द्रह निर्दोष लोग मारे गए, पचासों लोग घायल हो गए, जिन्हें ठीक होने में महीनों लगे। मास्टर इस्माइल को मार मारकर अधमरा कर दिया गया था। पुलिस ने उन्हें किसी तरह छुड़ाया। इस घटना के बाद मास्टर इस्माइल पागल हो गए। गुंडों के डर के मारे उनसे कोई भी सहानुभूति नहीं रखता। हमारा प्रशासन इतना निकम्मा है कि वह गुंड़ों को सजा नहीं दिला सका। आज भी ये सफेदपोश गुंडे खुलेआम घूम रहे हैं, जिनके डर के मारे संजय का परिवार, रश्मि और फहीम इस नगर में वापस नहीं आते। पता नहीं वह लोग कहाँ जाकर छिप गए हैं। पता नहीं हमारे देश में कैसा लोकतंत्र है जहाँ पर कोई आदमी या परिवार अपने ढंग से शांतिपूर्वक नहीं रह सकता। प्रशासन आम नागरिक की सुरक्षा नहीं कर सकता।

राम भरोसे तो अपनी बात कहकर चुप हो गया किन्तु मैं मानसिक रूप से अस्थिर हो गया। मास्टर इस्माइल के साथ इतना बड़ा हादसा हो गया था और मुझे अभी तक खबर ही न थी। मैं अस्पताल में अपनी ड्‌यूटी के स्थान पर बैठा था, जहाँ थोड़ी देर बाद ही इतनी चहलपहल हो जाने वाली थी कि मुझे शाम ढलने का पता ही न चलेगा।

मैंने राम भरोसे को उसकी सीट पर जाने की सलाह देते हुए कहा कि वह रात्रि को आठ बजे मुझसे ज़रूर मिले ताकि हम दोनों स्टेशन के सामने वाली धर्मशाला में मास्टर इस्माइल से जाकर मिल सकें। इसके पश्चात मैं अस्पताल की अनेकों उलझनों में खो गया।

आठ बजे रात में हल्की सी ठंड हो गई थी। मैं पेन्ट-शर्ट के साथ एक गरम स्वेटर पहनकर तैयार था। गैराज से अपनी कार निकाल ही रहा था कि राम भरोसे मेरे बंगले पर पहुँच गया। मेरा बंगला अस्पताल के पीछे ही था।

मैंने राम भरोसे को कार में बैठाया और स्टेशन रोड के लिए चल पड़ा। बीस मिनट का रास्ता था। पाँच मिनट तक उबड़-खाबड़ रोड को पार करने के बाद पक्की सड़क आई, मगर अँधेरा घनघोर था। बिजली के खंभों पर टूटी-फूटी लाइट म्युन्सीपैल्टी की बदहाली का रोना रो रही थी। अगले दस मिनट में रोशनी में नहाई पक्की सड़क पर पैदल चलते लोगों का हुजूम दिखाई देने लगा। जैसे ही स्टेशन पास आया लोगों की चहल-पहल और सड़कों के किनारे लोगों की दूकानें नज़र आने लगी।

एक स्थान पर सड़क के किनारे पंक्तियों में मैले कुचले वस्त्र पहने भिखारी बैठे हुए थे। उनके सामने भीख माँगने के बरतन रखे थे। इसी पंक्ति के पीछे पीपल का पेड़ था। इसके बाद खुला मैदान और एकदम पीछे एक पुरानी सी धर्मशाला बनी हुई थी। इस धर्मशाला की जर्जर स्थिति को देखकर वहाँ पर कोई भी ठहरना पसंद नहीं करता था। इसी मैदान में एक किनारे पर मैंने राम भरोसे के कहने पर गाड़ी रोकी। राम भरोसे की तेज़ निगाह ने देख लिया था कि भिखारियों की पंक्ति में मास्टर इस्माइल नहीं था।

वह बैठा है, इस्माइल, राम भरोसे ने इशारा किया। कार बंद करते हुए मैंने देखा कि वह धर्मशाला के बरामदे में जमीन पर बैठा था। पर दूर से ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था। रात्रि का हल्का सा अँधेरा था।

हम दोनों के कदम मास्टर इस्माइल की ओर बढ़ चले। हम चलते हुए उसके करीब पहुँच गए। वह बैठा शून्य में निहार रहा था। उसके बदन पर मैला, फटा पाजामा और एक फटी हुई शर्ट थी।

मैंने नीचे झुककर मास्टर इस्माइल का चेहरा देखा। चेहरे पर भी मैल की परत चढ़ी हुई थी। अनेकों झुर्रियाँ उसके सुंदर चेहरे को लील चुकी थी। उसके हाथ पर घाव के निशान थे। इस्माइल की यह दशा देखकर दुख और करूणा से मेरा मन पसीज उठा। पर प्रत्यक्ष में मैंने अपनी भावना पर काबू रखा।

फिर मैंने उसे हिलाकर कहा, मास्टर इस्माइल कैसे हो?

वह चिहुंक कर पीछे हटा, मैं इस नगर को नहीं छोडूँगा। मेरा खून करना है, कर दो।

मास्टर साहब, ये आपके मित्र हैं डॉ. महेन्द्र। आपसे मिलने आए हैं, राम भरोसे ने इस्माइल को संबोधित किया।

मिनिस्टर हैं तो शौक से मिलें। मेरे साथ गाना गाएँ- इस्माइल चहका, इंसान को इंसान से हो भाईचारा, यही पैगाम हमारा।

राम भरोसे मेरी ओर मुखातिब होकर बोला, सर! ये पागल हो चुके हैं। बार-बार यही गाना दोहराते रहते हैं, इंसान को इंसान से हो भाईचारा, यही पैगाम हमारा! किसी को मारते-पीटते या दुत्कारते नहीं है। किसी ने कुछ खाने को दे दिया तो खा लेते हैं वर्ना भूखे ही सो जाते हैं।

राम भरोसे! इनको बहुत बड़ा मानसिक आघात लगा है। इनका लगातार इलाज और सेवा करने से यह साल दो साल में ठीक हो भी सकते हैं और नहीं भी। फिफ्टी-फिफ्टी चांसेस हैं। रिस्क लेने की बात है।

परन्तु सर! ऐसा रिस्क लेगा कौन? इनके इलाज पर बड़ी रकम खर्च करना और सेवा करना बड़ा कठिन काम है। सभी बाल बच्चेदार लोग हैं। कौन आगे आए?

राम भरोसे! तुम इनको पकड़कर गाड़ी में बैठाओ। इन्हें अस्पताल में भर्ती मैं करूँगा। महँगी दवाओं पर मेरा रुपया खर्च होगा। मैं पहले इनके एक-दो छोटे ऑपरेशन करूँगा। दो माह बाद अस्पताल से छुट्टी हो जाएगी। फिर घर पर इनकी देखभाल नौकर की सहायता से मेरी पत्नी कर लेगी।

सर! इतनी भारी मदद आप करेंगे, राम भरोसे आँखें फाड़कर आश्चर्य से बोला,एक मुसलमान के लिए आप इतना सब कुछ करेंगे? इसे अपने घर में रखेंगे?

क्यों? इसने एक हिन्दू को अपना खून नहीं दिया था?

ठीक बात है सर! राम भरोसे एकदम अचकचा गया। उसे कोई जवाब नहीं सूझ रहा था। पर एक मिनट बाद ही वह अपनी खोपड़ी खुजलाते हुए बोला, सर! यदि यह ठीक हो गया और इसे पुरानी बातें याद आ गई तो बाकी की ज़िन्दगी गुज़ारना कठिन हो जाएगा। इससे अच्छा तो यह है कि इसे पागल ही रहने दें। बेचारा जुल्मियों और दंगाइयों को तो कम से कम भूल चुका है।

राम भरोसे की इस बात में काफी दम था। यदि मास्टर इस्माइल ठीक हो जाएँगे तो उसकी बाकी ज़िन्दगी कैसे गुज़रेगी, इस पर विचार करना ज़रूरी था। तभी मेरे दिमाग में अगली उपचार पद्यति के बारे में भी बिजली सी कौंधी और भविष्य की योजना की रूपरेखा बनती दिखाई दी। पर यह मौका उस रूपरेखा पर विचार करने का न था।

मैंने राम भरोसे को कहा, इस पर बाद में विचार करेंगे, पहले अपनी मित्रता का धर्म तो निभा लूँ साथ ही साथ मैंने मास्टर इस्माइल का हाथ पकड़कर उन्हें कार में बिठाया। राम भरोसे ने इस कार्य में मेरी मदद की।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें