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09.01.2007
 
मन के भीतर
रमेश देवमणि

 

आज तक मैं बाहर ही देखता आया हूँ

मुझे यह ही सिखाया गया है सब बाहर ही है।

इसलिए मेरे अंदर समंदर है या आकाश

आजतक पता ही नहीं चला!

मैं सिर्फ़ सोचता हूँ अपने सिवा सबकुछ

यह ही मुझे सिखाया गया है

और

सिखाया जा रहा है आजतक।

ज़िन्दगी की दास्तां पूरी होती जा रही है

पल-पल

मैं एक समस्या बना जा रहा हूँ अपने आपकी।

अगर हो ईश्वर तो भी

या

ना हो फिर भी

कुछ नहीं फ़र्क पड़ता मुझे भी।

मुझे चाहिए अपनी सही पहचान

हक़ीकत में यह सब क्यूँ हो रहा है

हमारे ही साथ-साथ?



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