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| 09.01.2007 |
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कैद रमेश देवमणि |
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कभी-कभी कैद लगती है ये ज़िन्दगी,
इस
धरती पर कैद,
इस
अंबर की कैद,
हवा
भी जीने देती है कैद कर-कर,
पानी
पीने की उम्र कैद,
रिश्तों नातों की कैद,
बीते
पल और आजकल की कैद
भूख,
भय, कामना, पीड़ाओं की कैद,
कैद
ही कैद है पल-पल ज़िन्दगी
फिर
भी क्यों रहती है तमन्ना जीने की? |
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