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09.01.2007
 
घर
रमेश देवमणि

 

घर पहुँचना ज़रूरी है

शरीर को रहने को कोई मुकाम चाहिए

वक़्त बड़ी बेरहमी से चला जाता है

रिश्ते बदलकर।

मैं फिर भी घर जाता हूँ

तब

मुझे घर

ओर

मरघट में कोई फ़र्क नज़र नहीं आता



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