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03.27.2014


आस्था का आडम्बर

यूँ तो चादरों की कमी न थी
मेरे देश में मज़ारों पर
देखो बाहर वो फकीर ठण्ड में
ज़िंदगी से रुख़्सत हो चला है
--00--
दूध की नदियाँ बहती हैं
मेरे देश के हर गाँव में
तीनों पहर होता पंचामृत
अभिषेक देवालयों में
देखो बाहर वो भिखारी भूख से
धरे हाथ पेट पर मर चला है

रोशनी इतनी है चौंधिया गई आँखें
मेरे देश में गिरजों पर
देखो वहाँ एक गरीब
अँधेरी झोंपड़ी में चाय की जगह
कीटनाशक पी चला है

शब्दों से अमृत झरता है
मेरे देश में गुरुओं के द्वारों पे
देखो बाहर भाई-भाई में
तलवारों का दौर चल पड़ा है

हे ईश, परमेश्वर, रब और वाहेगुरु
कहाँ है तू बता इनको ज़रा
पाने की आस में तुझको
धर्म के ठेकेदारों का धंधा खूब चला है

धर्म के नाम पर कमी नहीं है
मेरे देश में आडंबरों की
बोलियाँ लगती हैं आरतियों की
चूलों पर चल झुलसते हैं
देखो बाहर भीड़ में
कितने ही लोग कुचलते हैं


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