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ISSN 2292-9754

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03.23.2017


शहरों का शहर बनारस

जब आमों में बौर आते हैं, टिकोरे उगते हैं और जब (यहाँ प्रशान्त महासागर के बीच बसे हवाई द्वीप-समूहों के एक द्वीप ओआह पर बसे शहर होनोलुलु में, कम से कम मेरी कल्पना में ही) कोयल की टीस-भरी कूकों से चप्पा-चप्पा गूँज उठता है; जब खेतो और जंगलों में दूर बहुत दूर तक सरसों के फूलों की पीली चादर तन जाती है या फिर जब काली घटाएँ घिरती हैं, हवाएँ बगटुट-आवारा इधर-उधर फिर रही होती हैं और अचानक एक सतरंगी इन्द्रधनुष न जाने कहाँ से उछलकर आकाश की छाती पर आराम से पसर जाता है, तो मुझे घर की याद आती है। जी हाँ, मुझे बहुत याद आती है घर की, बनारस की, उस बनारस की जो गंगा के किनारे-किनारे, कुछ-कुछ इन्द्रधनुष जैसा ही दक्षिण से उतर तक पसरा हआ है। कहनेवाले तो यह भी कहते हैं कि गंगा के किनारे शहर नहीं बसा है। शहर के किनारे गंगा बसी हुई है। व्याकरण के पण्डित जानते हैं कि कैसे गंगा के बीचोबीच अहीरोंकी बसती गंगा में न होती हुई भी गंगा में ही होती हैं। गंगा के बीचोबीच न होता हआ भी बनारस गंगा के बीचोबीच है ही। है न यह अजीब बात? वैसे ऐसी अजीब बातें और भी कई हैं मेरे पास इस नगर के बारे में। चाहे आप यह मानने के लिए तैयार न हों कि बनारस बाबा विश्वनाथ के त्रिशूल की नोंक पर बसा हआ है या चाहे आप यह भी न मानें कि काशी में मरनेवाला सीधे स्वर्ग ही जाता है, पर आप को यह तो मानना ही पड़ेगा कि भारत में यही एक अकेली जगह है जहाँ गंगा उलटी बहती है। जी हाँ, और कहीं नहीं, बस यहीं बहती है उलटी गंगा - दक्षिण से उतर की ओर। हुई न एक और अजीब बात यह ? आइए आपका परिचय कराऊँ अपने इस अजीब प्यारे शहर से।

इस नगर के कई नाम हैं। अंग्रेज़ों के जमाने में इसका नाम था बनारस। लोग-बाग अभी भी बनारस ही कहते हैं। बना रहे बनारस। वैसे इसका सही नाम है वाराणसी। जी हाँ, यह नाम भगवान बुद्ध के जन्म के पहले से ही चला आ रहा है। वरणा और असी (आज का अस्सी) नदियों के बीच बसा हआ नगर। वरणा नदी वाराणसी नगर की उतरी सीमा है - यह नदी पश्चिम से पूरब की ओर बहती हुई गंगा मे जाकर मिल जाती है। असी शायद वाराणसी नगर की दक्षिणी सीमा पर पश्चिम से पूरब बहनेवाली एक छोटी नदी थी। आज तो इसका अस्तित्व एक छोटे नाले में ही सिमट कर रह गया है। इस नाले के पार, दूर तक, हिन्दू विश्वविद्यालय के विशाल कैम्पस (परिसर) के इर्द-गिर्द और उससे भी और आगे निकल गई है बस्तियाँ। काल के साथ- साथ काशी और बनारस के अतिरिक्त नामो से गुजरता हआ यह शहर फिर वारणसी पर आकर ठहर गया है। कल का अति प्राचीन सांस्कृतिक नगर आज अपने आप में कई छोटे-मोटे नए जन-संकुल नगरों को समेटे हए रोज ही नई सीमाएँ खींच रहा है। नगर बहुत पुराना है। पुरानी तो इससे सटकर बहती हुई गंगा भी है। यह बता पाना बहुत मुश्किल है कि नदी और नगर में कौन ज्यादा पुराना है। इनके बहुत पुराने होने की बात मैं बार-बार इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि इस नगर की आत्मा की पहचान इसके  पुरानेपन की बात उठाए बिना हो ही नहीं सकती। अच्छा तो सुनिए इसकी आत्मा की पहचान के बारे में।

बनारस एक तीर्थ नगर है। पण्डे-पुजारिओं, मन्दिरों-देवालयों का। यहाँ गली का कोई भी नुक्कड़ नहीं जहाँ एक मूर्ति अपने छोटे देवालय में पतिष्ठित न हो। यहाँ सारे रास्ते घूम-फिरकर गंगा की ओर जाते लगते हैं। सभी रास्ते यहीं गंगा किनारे आकर खतम हो जाते हैं। जिन्दगी का चक्कर भी तो यहीं खतम होता है - महाश्मशान पर। जी हाँ, मणिकर्णिका नाम है इस शहर के महाश्मशान का। इस महाश्मशान की आग कभी ठण्डी नहीं होती। वैश्वानर अपनी सहस कालजिह्वाएँ लपलपाता चौबीस घण्टे किसी दुर्मद की तरह चकरघिन्नी बना घूमता रहता है। लपटें और लपटें...लपटें ही लपटें। राख की ढेर पर बैठा महाश्मशान का रखवाला डोमराज यहाँ अब भी खप्पर में ढली सुरा पीता है। मांसपिण्डों की चिरायंध गन्ध उसके नथुनों की फड़फड़ाहट में तेजी लाती है। चिटकती हड्डियों की करताल पर थिरकता है डोमराज। जलो...जलो...जलो...मेरी दी हुई आग की लपटों में जलो। इसीलिए तो खरीदी थी यह आग तुम्हारे चाहनेवालों ने। हाँ वे ही, जिन्होंने राम-नाम सत्य की धुन पर कदम मिलाते हए दो बांसों की टिकटी पर तुम्हें ढोया, तुम्हारी चिता सजाई और मेरी दी हुई, या यह कहो कि मुझसे खरीदी हुई, आग लेकर तुम्हें लपटों के हवाले कर दिया। यह शरीर पांच तत्वों से बना है न ? क्षिति-जल-पावक-गगन-समीरा....तुम्हारा भस्मशेष शरीर अभी कुछ ही देर में गंगा को समर्पित कर देंगे ये। पंचतत्वों से बना पंचतत्वों में ही मिल जाएगा। महाश्मशान का यह सत्य पंचभौतिक जीवन का चरम सत्य है।

इस महाश्मशान के कुछ और भी सत्य हैं। एक तो मैं आपको बता भी चुका हं। अरे वही, डोमराज से खरीदी हुई आगवाला सत्य। जी हाँ, यहाँ हर जलनेवाला मरकर भी अपनी ही आग में जलता है। दूसरा सत्य? ये पण्डे-पुजारी, ये पिण्डेभोजी महाब्राह्मण। इन्हें हर आदमी श्मशान के बाहर घटिया और दसनम्बरी समझता है। पर न जाने चिता के सामने ये दसनम्बरी अचानक ही असली कैसे बन जाते हैं। दान देनेवाले की बुद्धि का विपरिणाम है यह। नहीं, नही, दान लेनेवाले की बुद्धि का कमाल है यह। आखिर वैतरणी पार करानेवाली बछिया के ताऊ से बचकर कहाँ जाएगा मरनेवाला। बेचारे उसके चाहनेवाले अधर में तो उसे लटका हुआ छोड़ नहीं देंगे। स्वर्ग से लटकी हुई सीढ़ी चन्द सिक्कों की एवज में सुलभ जो कराते हैं ये। कहते हैं यह महाश्मशान सीढ़ियों से उतर कर ही पहुँचा जाता है। देख लो ऊँचे से नीचे उतरती सीढ़ियाँ। कहनेवाले तो यह भी कहते हैं कि ये सीढ़ियाँ गंगा के गर्भ में बहुत दूर नीचे उतरकर पुनः ऊर्ध्वमुखी हो जाती हैं। जी हाँ, यहाँ से सीधे स्वर्ग की ओर। सीढ़ियाँ बनारस का बहुत बड़ा सत्य उजागर करती हैं। आइए अब चलते हैं ऊपर... जी नहीं, स्वर्ग की ओर नहीं। वहाँ जाने के लिए तो पहले मरना होगा। अभी तो देर है वहाँ के लिए। हाँ, आइए, ऊपर चलें। देख रहे हैं न ये छोटी-छोटी पत्थर की सीढ़ियाँ - और एक नज़र यह भी देखिए कि कितने ऊँचे तक जाती हैं ये। या यों समझ लीजिए कि गंगा का यह महाश्मशानवाला किनारा काफी नीचे है। यहाँ का रिवाज भी कुछ यही है- सीढ़ी-दर-सीढ़ी ऊपर जाइए और सीढ़ी दर सीढ़ी नीचे जाइए। अगर सीढ़ियाँ नहीं हैं तो गलियों से जाइए। जी हाँ, गलियाँ ! आपने असूर्यम्पश्या राजदाराओं की बात अक्सर सुनी है। पर आपने असूर्यम्पश्या गलियों की बात नहीं सुनी होगी। ऐसी गलियाँ यहाँ बीसियों हैं। एक घुघुरानी तो दूसरी कुकुरिया। पहली संकरी तो है ही पर इतनी घुमावदार है कि बस चलते ही जाइए। दूर बहुत दूर अन्ततः मिलना ही है गंगा किनारे, अगर बीच में ही किसी ने गली का गला न घोंट दिया तो। दूसरी गली बहुत लम्बी नहीं, है तो गलघुटी पर संकरी इतनी है कि दो कुत्ते साथ-साथ समांतर चलते एक दूसरे से आगे नहीं निकल सकते।

मुझे याद आता है अपना बचपन - जब ताऊ जी के घर आता था और कभी-कभी इन सीढ़ियों की ऊँचाई से नीचे पहुँचकर श्मशान तक पहुँचनेवाला ही होता कि पुनः ऊपर भागने लगता। श्मशानी धुएँ की गन्ध...बेबर्दाश्त हो जाती। जब भागता तो सीढ़ियाँ फलांगता तेजी से। जब इतने ऊपर पहुँच जाता कि धुआं सीधे नाक तक न पहुँच सके तो थककर कुछ दम लेता। फिर धीरे-धीरे सीढ़ियाँ गिनते दूधविनायक तक आता। एक सौ पैंतालिस हुआ करती थीं तब वे सीढ़ियाँ जिन्हें मैं धीरे-धीरे चढ़कर आता। बाद में उन फलांगी हुई सीढ़ियों का भी हिसाब कर लिया था मैंने एक दिन। छियासठ धन एक सौ पैंतालिस बराबर कुल दो सौ इग्यारह सीढ़ियाँ - इन सीढ़ियों की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि बनारस के पण्डे और सीढ़ियाँ दोनों ही मशहूर हैं। इनसे बचकर रहने में ही कल्याण है। वैसे बच कर रहनेवाली और भी कुछ चीजें हैं यहाँ - जैसे – रांड़, सांड़ और संन्यासी। इन तीनों के साथ ही कुछ बातें एक जैसी ही लागू होती हैं। तीनों ही मुफ़्त का माल चांपते हैं और छुट्टा घूमते हैं। रांडें अब कम होती जा रहीं हैं क्योंकि धीरे-धीरे बाहर से यहाँ आकर मरने की इच्छा रखनेवाली रांडें या तो खर्चे की कमी से या फिर जिन्दा बने रहने की कामना से यहाँ आने की सोचती ही नहीं। पहले जो यहाँ आती थीं शायद बीमारी की हालत को मरने की स्थिति मानकर आती थीं पर कुछ दिन के दाना-पानी के बाद चंगी हो जाती थीं। फिर तो जिजीविषा को पनपते और बढ़कर फिलहाली स्थायीभाव पाते देर न लगती। फिर क्या था। मांगना और खाना और घूमना। अब तो इनकी संख्या काफी कम हो गई है। जो भी हो, यह बनारस के एक तीसरे सत्य का अंग हैं। एक स्थानीय मुहावरा है – रांड, सांड, सीढ़ी, संन्यासी, इनसे बचे तो सेवे कासी। वाराणसी की कल्पना षंड या सांड़, और राण्ड या संन्यासी, के बिना अधूरी ही रह जाएगी। षंड के न होने की बात तो संभव ही नहीं। शिव की नगरी में नन्दी-कुल की समृद्धि नकारी ही नहीं जा सकती। गलियों, सडकों, नुक्कडों और चौराहों पर फूले, पिचके, पिटे, घिसे, सीकिया या मुसटण्डे षंड हर जगह मिलेंगे। गो-कुल की समृद्धि भी तो इन्हीं गो-प्रसूतों से जुड़ी है। अब वाराणसी में रहना है तो इनसे कहाँ तक बचना। ये खुद-मुख्तार हैं, इनकी खुद-मुख्तारी पर कोई प्रश्न-चिह्न नहीं। रही बात संन्यासियों की तो शंकराचार्य से लेकर अब तक कई नामी-बेनामी संन्यासियों की लम्बी फेहरिस्त पेश कर सकता हूँ। जिन संन्यासियों ने भोग त्याग कर स्वयं श्राद्ध किया और ज्ञानमार्गी बन जीवन्मुक्त हो गए, या होने की प्रक्रिया में हैं, उनसे मेरी कोई शिकायत नहीं। शिकायत तो उनसे है जिन्हें जान की हर घुटी कड़वी लगती है और जो अपने पैरों को लिप्सा की फिसलन से न बचा पाने के कारण तृष्णा के मोह जाल में उलझ जाते हैं। ऐसे अनगिनती उलझे संन्यासी, महन्त, और गैरिक वस्त्रधारी, मुंड, जटाधारी या खल्वाट छद्म-सिद्ध वाराणसी में हर कोने मिल जाएँगे। आपक ऐसे ही छद्म-सिद्धों से बच े रहना है। वैसे वाराणसी में ठगी की अपनी एक अलग ही पहचान थी। संभवतः यह ब्रिटिश काल तक की ही सच्चाई हो। अब तो ठगी के सटैंडड्‌र्स ही बदल चुके हैं।

शिव नगरी काशी के तीन प्रसिद्ध तीर्थ हैं - काशी विश्वनाथ (ज्योतिर्लिंग) मन्दिर, काल-भैरवजी का मन्दिर और गंगा तट - मुख्यतः पञ्चगंगा से अस्सी घाट तक। यह विश्वनाथ क्षेत्र ही वाराणसी का हृदय प्रदेश है। अन्नपूर्णा सहित विश्वनाथ की परिक्रमा में रचा-बसा यह शताब्दियों से ऐसा ही है। हाँ एक बहुत बड़ा परिवर्तन कभी नजरंदाज नहीं किया जा सकता। यहाँ एक मस्जिद भी है - विश्वनाथ मन्दिर के ठीक पीछे उतर की ओर लगे हाथ। कहते यह हैं कि मुगल सैनिकों ने पूर्व-स्थापित विश्वनाथ मन्दिर को तोड़कर उसकी जगह मस्जिद बना दिया। भूतभावन विश्वनाथ पास के कुएँ में कूद गए। वहीं से लाकर उन्हें अहल्या बाई होलकर द्वारा बनवाए गए आज के स्वर्ण मन्दिर में प्रतिष्ठित किया गया। विश्वनाथ मन्दिर के बाद चलें इस शहर के कोतवाल काल भैरव के मन्दिर की ओर। इसे मात्र संयोग ही नहीं मानना चाहिए कि उनका मन्दिर वर्तमान कोतवाली से कुछ दूर पर ही है। मुझे याद है मेरी माँ बचपन में हमेशा भैरवजी का दर्शन कराकर डंडे लगवाती थी। पंडों को दक्षिणा देती थी। एकाध बार मेरे बालों की कटाई भी हुई है यहाँ। पहले बकरों की बलि भी लेते थे भैरव बाबा। अब तो संभवतः लोगों की बुद्धि पर तरस खाते हए उन्होंने ऐसी बलि लेनी बन्द कर दी है। फिर भी आप जाइए और सुबह से शाम तक अगर बाबा के मन्दिर पर धरना दीजिए तो आपका दूसरा लोक तो उनके आशीष से संवर ही जाएगा, इस लोक के लंद-फंद से जूझने की ताकत भी मिलेगी। कासी सेवन का एक दूसरा अंदाज भी है। यह बनारस का चौथा सत्य है-

चना, चबेना गंग जल जो पुरवै करतार।
कासी कभी न छोड़िए विश्वनाथ दरबार।।

मैं इसका एक दूसरा ही संसकरण प्रस्तुत करना चाहूँगा -

चना भंग गंगा-जल पाना।
विश्वनाथपुर छोड़ न आना।

अगर भगवान विश्वनाथ की कृपा से चना, भांग, गंगा-जल और पान मिलता रहे तो बनारस छोड़ कहीं और जाने का जोखिम कोई क्यों उठाए। यही एक शहर है जहाँ अकेला चना भी भाड़ झोंकने की अहमियत रखता है। रही भोजन के लिए चना ही काफी है की बात - तो इस पर बहस की गुंजाइश हो सकती है। जिसकी गांठ में नामा हो वह चने की कीमत नहीं आंक सकता। जिसका गरूर यह हो कि वह चने खाकर भी ताल ठोकता हुआ काशी में ही रहने का जोखिम उठाएगा ऐसा ही आदमी चना खाकर अकेले भाड़ झोंकने की हिमाकत कर सकता है। यहीं भांग के बारे में भी कुछ कहना जरूरी हो जाता है। अगर नहीं तो इस तरह यह सारी दुनियाँ पर क्यों हावी हो जाता। बनारस मस्त शहर है और इस म्स्ती के लिए भांग एक निहायत जरूरी चीज है। सुनते हैं कि जापानी लोग चाय-पान के पहले चाय-संस्कार करते हैं। भांग पीने या गोला निगलने के पहले उसका संस्कार जरूरी हो जाता है। पहले गंगा के किनारे या गंगा पर तिरती हुई नावों में सिलबटे पर भांग पीसने का रियाज हुआ करता था। यही रियाज इस संस्कारी शहर का भंग संस्कार पर्व बन गया था। एक ऐसा पर्व जो साल के हर दिन मनाया जाता था। संस्कृत भांग विजया की संज्ञा पाकर संस्कर्ता के लिए विजया-पर्व बन जाता था। एक ऐसा पर्व जिसका धर्म मस्ती से अलग और कुछ हो ही नहीं सकता। आज यह भंग-पर्व महा-शिवरात्रि और होली के दो विशेष दिनों तक ही सीमित होकर रह गया है। होली का भंग-पर्व बहुत हद तक आधुनिक सुरा पर्व बन गया है। बुढवा-मंगल, यानी गए साल के आखिरी मंगल की रात, गंगा के वक्ष पर बजरों पर खनकती घुंघरुओं की आवाज पर रूपाजीवाओं की थिरकन, भंग की तरंग में बहकते रईसों की आन-बान अब याददाश्त की बात भर रह गई है। बनारस की रईसी मर चुकी है, ठीक वैसे ही जैसे यहाँ की गुण्डा संस्कृति। महाराज बनारस श्री चेत सिंह के जमाने तक वाराणसी की गुण्डा-संस्कृति सदाबहार रही। वारेन हेस्टिंगज़ को इसी संस्कृति ने धूल चटाई। तब गुंडा शब्द का अर्थ ही अलग हुआ करता था।

महाशिवरात्रि के भंग-पर्व को तो इसे तब तक कोई खतरा नहीं जब तक वाराणसी शिव के त्रिशूल पर टिकी रहेगी और जब तक लोक-मानस लोकगीतों में रचा-बसा पार्वती का यह उपालंभ गुनगुनाता रहेगा कि,

हे भोलेनाथ, तुम्हारी गैल मुझे नहीं रहना।

सिर चढ़ी गंगा क्या कम थी जो एक दूसरी मलामत भांग ले बैठे।

इसे घोटने का दर्द उतना नहीं जितना तुम्हारे सिर चढ़कर इसके बोलने का ...घोंटने के इसी दर्द ने अब भांग और ठंडाई को सड़कों पर उतार कर रख दिया है। जी हाँ, भांग घोटने और ठंडाई छानने की बात घरों से उठ कर गुदौलिया की कुछ दुकानों पर जाकर बैठ गई है। अब आपको छानना हो तो गुदौलिया पर मिश्राम्बु जाइए, उससे आगे जा सकें तो बांस-फाटक की ढाल पर कन्हैया चित्र-मन्दिर से आगे बाईं ओर गली में जाइए। मेरी दृष्टि में छान-पर्व का दिव्य तीर्थ यही है। भांग-ठंडाई के साथ, खासतौर पर बनारसी (मगही) पान का योग मणि-काञ्चन योग की तरह ही मान्य होना चाहिए। पान की महिमा आयुर्वेद से लेकर संस्कृत काव्यों तक सर्वत्र चर्चित है। पान फेरा जाता है, कत्था जमाया जाता है, और चूना लगाया जाता है। यही फेरने, जमाने और लगाने की लयात्मक प्रक्रिया मगही पान के पत्तों पर उतर कर रसानुभूति बन जाती है। इस रसानुभूति का सद्यः उद्रेक जर्दे के बिना कुछ विशेष रियाज से ही संभव है। यही पान है जिसके दो बीड़े महाराज श्री हर्ष के कर कमलों से पाकर अतीत का कवि जीवन का सर्वस्व प्राप्त कर लेता था। अब तो केशव का पान बनारस की शान बना लंका तिराहे पर धूनी रमा कर बैठ गया है।

अब अन्त में आइए गंगा पर जो वाराणसी की पहचान है। इसके घाट और पाट दोनों ही अपने आप में इस शहर का इतिहास छुपाए सदियों से जी रहे हैं। गंगा मात्र नदी नहीं है। यह तो भारतीय काल-चक्र में रसी-बसी वर्तमान की कोख से उभरी अतीत की भविष्य-सन्तान है, आत्मा है। चूंकि आत्मा नित्य है इसलिए गंगा भी नित्य है। गंगा न कभी पैदा हुई, न मरी, न फूली, न फली, न विकसी, न झरी - बस सदा एकरस बनी रही। यही गंगा का एकरस बने रहना परंपरा है। लेकिन लोग तो कहते हैं कि गंगा का प्रादुर्भाव हिमालय में गंगोत्री में हुआ। यह दृष्टि-दोष है। गंगा का प्रभव गंगोत्री में अवश्य हुआ। पर प्रभव शब्द का अर्थ क्या है। ईसा पूर्व दूसरी शती के पतञ्जल–कृत व्याकरण-महाभाष्य में प्रभव शब्द का अर्थ प्रादुर्भाव नहीं माना गया है। इसमें न्याय-वैशेषिक और सांख्य दर्शनों के साक्ष्य पर यह बताने की कोशिश की गई है कि प्रभव का अर्थ प्रथम दर्शन है। इस प्रथम दर्शन की साक्षी भी परंपरा ही है - भरत के भारत की कालजयी बहु-आयामी बृहतर परंपरा। इस कालजयी परंपरा की चचा1 क्रमशः, फिर कभी, अभी तो बस इतना ही।


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