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ISSN 2292-9754

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03.23.2017


 लाली मेरे लाल की...

लाल चन्द, भुअरू सूबा साहब उर्फ़ सूबा विधाता की निर्माणकला के कुछ ऐसे नमूनों में से थे जिन्हें देखकर लोग बरबस कह उठें - बनानेवाला भी कभी-कभी अपने खिलौनों से ही मज़ाक कर बैठता है। जन्म हुआ था होली के दिन शायद इसीलिए लाल-ललछौंही, छिली-छिली सी, खून झलकाती पारदर्शी चमड़ी लेकर पैदा हुए थे। कान बड़े-बड़े, नाक चिपटी सी और बाल भूरे - ढेर के ढेर सारे बदन पर। इन सबके ऊपर चमड़ी से भी कहीं अधिक पारदर्शी दो बड़ी-बड़ी नीली आँखें। ले-देकर भुअरू - भूरे बालों के कारण यही नाम चल पड़ा था- गाँव के लिए एक बहुत बड़ा अजूबा बनकर पैदा हुए थे। कुछ लोगों ने तो यह जानकारी भी दी थी कि विधाता शिवजी के यहाँ होली मिलने गए थे और वहीं डट कर भाँग पी गए। लौटती बार नशे में घर लौटने की बजाय फैक्टरी पहुँच गए। नशे-नशे में उन्होंने भुअरू को बना कर धीरे से धरती पर टपका दिया। इसी तरह कुछ और भी खुसुर-फुसुर सुनी गई थी। जो भी हो भुअरू के जन्म पर थाली नहीं बजी। सोहर नहीं गाए गए और गाँव-घर की औरतों के जूओं भरे बालों में सरसों का तेल चुपड़ सिन्दूर की टहक लाल लकीर भी नहीं खीची गईं। चमाइन तो शक़ल देखते ही भाग गई। माँ-बाप ने सिर पीट लिया। पर कूड़े के ढेर पर फेंक भी तो नहीं सकते थे। नाम रखा लालचन्द, वैसे भुअरू न लाल थे, न चन्द और न ही लालचन्द। भुअरू भुअरू थे। पाँच-छह साल का एक चचेरा भाई था, उसी के नाम से चन्द लेकर इनके लाल रंग के साथ जोड़ दिया गया, …बस हो गए लाल चन्द।

भुअरू पलने और बढ़ने लगे - बिना किसी के पाले और बढ़ाए। उनकी ज़िन्दगी के पहले पन्द्रह साल गाली, घृणा और तिरस्कार में ही बीते - न अच्छा खाना, न पहनना, न ही माँ-बाप का प्यार। हर आदमी जैसे उनको अछूत समझता था। ऐसा नहीं कि कोई उन पर तरस खानेवाला नहीं था। लेकिन तरस खाने भर से तो भुअरू का जीना आसान नहीं हो जाता। मेला-तमाशा हो एक धेले की टिकरी तक नहीं खा सकते थे। जी ललच कर रह जाता कि आम लड़कों की तरह वे भी खेलें पर अड़ोस-पड़ोस के लड़कों की कौन कहे अपने ही घर-आँगन के लड़के साथ खेलने देने को राज़ी नहीं होते। उमर में छोटे चचेरे भाई तो और भी फिस्स निकालते थे। भुअरू हमेशा ललचाई आँखों से सबको खेलते देखते रहते। आख़िर तरस कर रह जाने की भी एक हद होती है। उमर के पन्द्रहवें साल में अचानक एक हादसा हुआ जिसने भुअरू की ज़िन्दगी का नक़्शा ही बदल कर रख दिया। यह वही साल है जब भुअरू को पहली बार महसूस हुआ कि वे अचानक बहुत बड़े हो गए हैं। साथ ही यह एहसास भी कि लोगों की तरस बटोरकर जीने की आदत अब उनको छोड़नी होगी। कि उन्हें अपने आप पर ही भरोसा करना होगा, आगे जो भी हो।

भुअरू के घर के पीछे एक बहुत बड़ा पीपल का पेड़ था - लबे राह। चूँकि रास्ते के उस पार बरगद के विशाल पेड़ के नीचे चबूतरे और कुएँ की जगत पर गाँव के बड़े-बूढ़े दुपहरिया काटने के लिए जमते थे इसलिए बच्चों का दल का दल पीपल के नीचे जमता। खेलनेवालों में आस-पास के तेली, कोइरी, बरई, माली, गोंड़, मियाँ, नोनियाँ, कमकर और पण्डित परिवारों के बच्चे होते। कभी कबड्डी-गुल्ली-डंडा और कभी गोलियों-कौड़ियों का खेल जमता। तमाशबीन छुटभैये तमाशा देखते और खेलने वाले खेलते। रोज़ की तरह आज भी खेल जमा था - गोली का खेल। एक से एक छप्पन-छुरी चुटीली शिशइलियाँ और चमकदार चुटीले सफ़ेद अण्ठे। भुअरू की गोली-साधना एकलव्य की साधना से किसी मायने में कम न थी। क़िस्मत भी इस मामले में उनके साथ थी - किसी द्रोणाचार्य को गुरुदक्षिणा में तर्जनी या अँगूठा देने का सवाल भी नहीं उठता था। रो-गाकर माँ से एकाध-धेले गाहे-बेगाहे ले लिए और धीरे-धीरे चार अण्ठे और छह शिशइलियों की चमकीली जमात तैयार हो गई। भुअरू का निशाना अचूक था। पर इस अचूक निशानेबाज़ी के पीछे कठिन साधना थी। जब और लड़के एकजुट खेलते होते तब भुअरू दूर कोने में विभिन्न कोणों से, लगातार बढ़ाई जाती दूरियों से अपने निशाने पर चोट करने की क्षमता बढ़ा रहे होते। कभी दोनों पैरों पर उचके बैठे हुए दाहिने हाथ का अँगूठा ज़मीन पर दबाए, या कभी एक पैर पर खड़े दूसरे पैर के मुड़े घुटने पर अँगूठा जमाए, पहली या दूसरी उँगली की कोर पर बाएँ हाथ के अँगूठे और पहली तथा दूसरी उँगलियों से गोली दबाए देर तक अपने लक्ष्य पर वार करने की साधना करते रहते। जब गोली छूटती तब निशाने पर ही लगती। भुअरू दूर-दूर तक लक्ष्य-भेद करने में पारंगत हो चुके थे। मजाल है कोई निशाना चूक जाय। सबसे अधिक प्रसन्नता तो उन्हें तब होती जब उनकी मार से निशाने वाली गोली टूट कर चकनाचूर हो जाती। वैसे बाद में उन्हें बहुत अफ़सोस भी होता एक गोली खो देने का, पर निशाने का टूट कर बिखर जाना एक अपरिमित संतोष दे जाता था उन्हें।

गोलियों में उनकी जान बसती थी। मजाल है कि एक क्षण भी भुअरू उन गोलियों से दूर रह जायं। कमर के मज़बूत नाड़े से बँधी एक लम्बी-लटकी कपड़े की झोली में निहायत जतन से रखी जाती थीं ये गोलियाँ। झोली का मुँह चौड़ाई में आर-पार पिरोए गए दो मज़बूत धागों के सिरों को एक-दूसरे से उलटी ओर खींचने पर खुलता और बन्द होता। भुअरू चलते तो गोलियों की आपसी टकराहट एक अजीब लयात्मक आवाज़ पैदा करती। तब कुछ और ही जब वे तेज़ चलते और झोली बार-बार उनके घुटनों से टकराती। लोग-बाग देख-सुनकर हँसते पर भुअरू के लिए यह अपनी गोलियों के सही-सलामत होने की आश्वस्ति थी। जबसे उन्होंने दूर-दूर तक सही चोट करने की कला में महारत हासिल की थी तब से, कम से कम गोली के खेल से तो, उनका जाति-निकाला लगभग बन्द सा ही हो गया। हाँ, कभी-कभी जब उनकी निशानेबाज़ी हद से बेहद्द हो जाती तो उन्हें सब लौण्डे एकजुट हो खेल से बाहर कर देते। कौन खेले ऐसे के साथ जिसका कोई निशाना ही न खाली जाय।

उनकी उमर के पन्दरहवें साल में जिस दिन यह हादसा हुआ उस दिन भी खेल ज़ोरों पर था पर भुअरू को कोई साथ खिलाने को तैयार नहीं। आधे घण्टे पहले ही उनकी सटीक निशानेबाज़ी के कारण उनको बाहर बैठा दिया गया था। फूलचन्द, सिरिया, मंगरुआ तीनों ने इंकार कर दिया वापस खेल में लेने से। मंगरुआ ने तो निकलवाया ही था पहले। ले-देकर हरिया ही बच गया था जो शायद भुअरू की गुहार सुन सके। भुअरू ने प्रेम, ललक और कुछ कुछ आजिज़ की मिली-जुली सी आवाज़ में अनुरोध किया। पर यह क्या? ई साला हरिया बोलता है कि ललका बानर के चूतर जैसा मुँह ले के फरके खड़ा होखो। भुअरू ऐसे तिरस्कारी बोलों की आँच में पकने के आदी हो गए थे। पर आज तो हद ही हो गई। आज तक किसी ने भी उनके मुँह की तुलना ललके बन्दर के चूतर से नहीं की थी। भुअरू के लिए यह अपमान बेबर्दास हो गया, लिहाज़ा आव न देखा ताव एक ही झपट्टे में उन्होंने चार-छह गोलियाँ उठाईं और यह जा वह जा हो लिए। बच्चे पीछे दौड़े। लेकिन फिर वही साला हरिया। दौड़कर पीछे से आया और मार दिया अडंगी। भुअरू बेचारे मुँह के बल गिरे। दाँतों के बीच फँसकर जीभ कट गई। ओंठ भी कट गया और सारा मुँह लहू-लुहान। कुछ सम्हले तो देखा कि हरिया छाती पर बैठा हुआ मुट्टियों से गोलियाँ छीन रहा है। तभी सिरिया अचानक अपने एक पैर का भरपूर वज़न डाल झटके से उनके हाथ की बँधी मुट्टी पर चढ़ कर खड़ा हो गया। भुअरू के मुँह से आह निकल गई। गोलियाँ तो छिनी हीं, ऊपर से हरिया ने दो-चार घूँसे भी जड़ दिए। भुअरू कराहते उठे - सोचा यहाँ से दूर छिटको पर यह चोट सहें तो कैसे। पास ही पड़ा मिल गया पत्थर का एक नुकीला टुकड़ा। आव न देखा ताव तान कर भुअरू ने पत्थर दे मारा और हरिया बाप-बाप कहता हुआ सिर पकड़ कर बैठ गया। भुअरू ने जब खून देखा तो बगटुट भगे रेलवे लाइन के उस पार खैरा के घने बग़ीचों की ओर। गाँव से कुछ दूर रेलवे लाइन के पार यही वे बग़ीचे हैं जहाँ हमेशा ही उन्हें सकून मिलता रहा है।

इधर बालमण्डली ने हरिया को घर पहुँचाया जहाँ उसकी माँ ने सिर का घाव धोया और एक चिथड़ा जलाकर उसकी राख से घाव को बन्द कर दिया। अब लगी खोज होने भुअरू की। खैरा पहुँचकर भुअरू ने पहला काम किया कोई सुरक्षित स्थान खोजने का - एक ऐसा स्थान जहाँ चण्डाल चौकड़ी उन्हें पकड़ न सके। वे खैरा के दक्षिण-पश्चिमी कोने पर, कुएँ से दूर - बरना ताल के उत्तरी छोर पर - जहाँ आज भी माई का बग़ीचा है - गए। यहाँ से दक्षिण गाँव का श्मशान है और पश्चिम ओर घने बग़ीचे। यहाँ तो दिन में भी लोगों को भूत नज़र आते हैं। भुअरू के साथ ईश्वर ने चाहे और जो भी किया हो उन्हें डरपोक नहीं बनाया था। ऐसा शायद इसलिए भी हो क्योंकि जिस नाक-नक़्श और नियति के भुअरू थे उसमें कम से कम अगर कुछ इजाफ़ा करने की गुंजायश नहीं थी तो कमी भी नहीं की जा सकती थी। उनका कोई क्या टेढ़ा कर सकता था। अरे उनका सीधा ही क्या था जिसके लिए वे हलकान होते। डर तो उन्हें बिलकुल नहीं लगा पर यह अकेलापन सचमुच एक अलग हादसा था। ऐसा नहीं कि खैरा के बग़ीचों में वे भटके नहीं थे। कई बार आए-गए हैं यहाँ। इसके चप्पे-चप्पे से वाकिफ़ हैं पर इस बार का आना तो कुछ और ही है। इस बार तो यह नहीं लगता कि कब वापसी होगी और कितने दिन तक चोर की तरह जीना पड़ेगा। क्या खाएँगे, कहाँ सोएँगे? और कोई तो नहीं लेकिन माँ ज़रूर खोजेगी। हे भगवान, कैसी मुसीबत में जान फँस गई।

चार दिन बीत गए। इस बीच भुअरू दिन में अक्सर पेड़ की डाल से चिपके सोते रहते। रात में उतरते और इधर-उधर भटकते। कुछ भोजन की तलाश करते। पर हरे चने-मटर, सकरकन्द, गाजर, बेर तथा अमरूदों के अलावा कुछ ख़ास हासिल नहीं हो पाया। आफ़त की मारी एक बकरी भटक कर अपने मेमने के साथ बगीचे में आ गई थी। भुअरू ने मेमने को देखकर सोचा बकरी ज़रूर दुधारू होगी। थी भी। भुअरू ने बड़ी दौड़-धूप के बाद बकरी को पकड़ा और उसका दूध पिया। पाँचवें दिन भुअरू ने थोड़ी हिम्मत से काम लिया। पेड़ से उतर कर पूरब ओर कुएँ पर गए। फिर धीरे-धीरे पण्डितों के डेरों की तरफ़। थोड़ी ही दूर गए कि बलिराम पण्डित दिख गए जो फराकित होकर आ रहे थे। बोले- "अरे तू कहाँ था रे भुअरू। तेरी महतारी तेरे लिए हलकान हो रही है। हरिया ठीक-ठाक है और उसकी माई अब तुमको कोई सांसत नहीं देगी। तू अब घर लौट जा।" भुअरू को न जाने क्या हुआ कि पुक्का फाड़कर रो पड़े। बलिराम पण्डित ने अपना लोटा ज़मीन पर रखा और लगे भुअरू को समझाने – "अरे ई खेल-खेल में झगड़ा तो होगा ही रे। तुमने मारा-मारी की तो वो सब क्या तुम्हें छोड़ देगा। इसमें क्या बात है रे! जाआ रे, घर जाओ।"

पिछले चार-पाँच दिनों के आत्म-निर्वासन ने भुअरू को अचानक ही बहुत चिन्तनशील बना दिया था। लगता तो यह भी था कि वे अचानक ही बहुत बड़े हो गए हैं। अपनी आँखों के आँसू गोलियोंवाले झोले से पोंछते हुए भुअरू ने इतना ही कहा – "अब कइसा घर। हम तऽ अब घर छोड़ दिया। अगर दया हो तऽ हम इहें रउवा डेरे के एगो कोना में रहि जाईं। राउर गाइ चराइबि, रउवा खेते में काम करबि आ डेरा पर राउर सेवा।" बलिराम पण्डित को तो कोई एतराज़ नहीं था पर भुअरू के माँ-बाप से पूछे बिना वे 'हाँ' भी कैसे कह सकते थे। बोले- "अउर तुम्हारा माँ-बाप बोलेगा कि हमारा बेटा से बेगार कराते हैं तों? तुम जाओ पहिले ऊ लोग से पूछो।" भुअरू ने कहा ऊ गाँव नहीं जाएँगे। हाँ अगर माई यहाँ आई तो उससे जरूर पूछ लेंगे। बलिराम पण्डित ने गाँव जाकर भुअरू की माँ को बता दिया। माँ रोती-कलपती आई। बेटे को घर ले जाने की उसने बहुतेरी कोशिशें भी कीं पर भुअरू टस से मस नहीं हुए। हार कर माँ ने वहीं रहने की उनकी ज़िद मान ली। ऐसा नहीं है कि भुअरू उस दिन के बाद गाँव गए ही नहीं। गए और बाद में भी जाते रहे पर उस दिन के बाद का जाना कुछ अलग क़िस्म का ही जाना था। भुअरू काम होता तभी जाते चाहे अपने घर या बलिराम पण्डित के घर। काम ख़तम हुआ नहीं कि भुअरू फिर वापस खैरा। यह उनके खैरा में रच-बस जाने के बाद की बात है कि एक दिन बलिराम पण्डित अपने बेटे नगीना को उलटा-सीधा कह रहे थे। नगीना की शादी हो गई थी और वह था कि कुछ करने के नाम पर जीता ही नहीं। बलिराम पण्डित उसको कहते जा रहे थे-

"अरे हमने तो तुम्हारा सादी करके बड़ा गल्ती कर दिया रे भाई। तुम तो न तीन का है न तेरह का। काम-धाम कोई नहीं और सोचना ऐसा कि तुम लाट साहब हो। अरे, कुछ खेती-बारी का ही काम करते"। नगीना सुनते रहे और बलिराम पण्डित थोड़ी देर बाद बड़बड़ा कर गाँव की ओर चल दिए।

पिता के जाने के बाद नगीना ने जेब से सुर्ती निकाली और लगे मलने। जब सुर्ती मल-फटक नगीना ने फाँक कर निचले ओंठ में दबा ली तो भुअरू बोले – "हम तऽ जनते नइखीं कि लाट साहब के हऽ। नाम तऽ बड़ा अच्छा बा।"

"चुप रहो भुअरू। हमारे जले पर नमक मत छिड़को। हम लाट साहब लगते हैं तुमको। अरे साले! लाट दिल्ली में रहता है। ऊ अंगरेज़ बहादुर होता है। उसका मुँह ही नहीं सारा देह ललका बन्दर का चूतर की तरह लाल होता है और अउर उसका लाल-लाल गाल वाला मेम भी होता है। तुमको मालूम है कि इलाहाबाद में हाईकोट के पास एक और हाकिम रहता है सूबा साहब और वह सीधे बात करता है लाट साहब से। इहाँ गाजीपुर में जिला पर भी एक डिप्टी साहब रहता है ऊ सूबा साहेब से सीधा बात करता है। अब तो सुनते हैं कि बलिया भी जिला बनेगा अउर इहाँ भी एक डिप्टी आएगा। साहब तऽ ऊ सब है। अरे हमारा जैसा बांभन पूत साहब अउर लाट कइसे होगा रे? बोल तो।"

"लेकिन इहाँ का लाट साहब तो आपे हैं," भुअरू खड़ी बोली में नगीना की नक़ल
करते से बोले। नगीना के पास इसके लिए धीरज तो था नहीं, बोले- "अरे सरऊ, अगर हम लाट साहब हैं तऽ तूं का सूबा साहब हो? अउर अगर तूं सूबा है तऽ ऊ देख रमगोबिना को- ऊ साला भी तऽ कुछ हइए है? ऊ डिप्टी साहब है?" फतिंगन एक साँस में फटकार गए।

अब इसके बाद क्या हुआ किसी को कुछ नहीं मालूम। लेकिन गाँव के लोगों ने धीरे-धीरे नगीना को लाट साहब, भुअरू को सूबा साहब और रामगोबिन को डिप्टी साहब कह कर बुलाना शुरू कर दिया। बाद में और भी कई साहब आए। जैसे मुखिया भी मुखिया साहब हो गए और अलीपुर सेंट्रल जेल के जमादार जमुना पाण्डेय जमादार साहब हो गए। बाद में इस लिस्ट में एक और नाम जुड़ा- श्रीकांत पाण्डेय उर्फ़ बैरिस्टर साहब का। इन सब में अकेले सूबा ही ऐसे थे जिनके नाम से न जाने कब और कैसे साहब शब्द का लोप हो गया। भुअरू मात्र सूबा रह गए। पर उन्हें इसका मलाल नहीं था। अब वे जवान हो गए थे, अपने आप पर मुक़म्मल भरोसा भी हो चला था। उनके लिए अब भुअरू कहे जाने से सूबा कहा जाना कई मायनों में कई गुना बेहतर था। भुअरू अब खैरा के मुक़म्मिल बाशिन्दों में से एक हो गए। पहले अक्सर गाँव भी जाते थे पर इधर कई सालों से अब वह भी छोड़ दिया है। क्या करेंगे गाँव जाकर? गाँव का मोह गृहस्थी की ओर खींचता है और भुअरू शायद गृहस्थ होने के लिए पैदा ही नहीं हुए थे। कौन शादी करता भुअरू से अपनी बेटी की? कोई नहीं न? फिर भुअरू ठूँठ बनकर ही जिएँ तो किसी का क्या बिगडता है। भुअरू अब यहीं अपनी झोपड़ी में रहते हैं। लाट साहब की खेती करते हैं और खाने भर को पूरा मिल जाता है। और उन्हें चाहिए ही क्या? अरे कोई आगे-पीछे होता तो कुछ परेशान भी होते! यहाँ तो आगे नदी है और पीछे कुआँ। बोलो भुअरू, कहाँ गिरोगे! चुप पड़े रहो बच्चा, तुम खैरा के ठूँठ हो। ठूँठ होकर जिओ। तुम्हारी कुण्डली में घर-गिरस्ती नाम की चीज़ है ही नहीं। जिस दिन तुम्हारा ठूँठ खोखला होकर गिर जाएगा उस दिन के बाद तुम्हारा नामलेवा भी कोई नहीं रहेगा। लेकिन "ई धमकवा, ई साला भतीजा हमसे क्यो चिपका रहता है। क्यों? क्यों? ई साला माया-मोह में मन बाँधता है मेरा!


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