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एक
कन्दीलों की नोक से टँगी
तस्वीरें, तस्वीरों से उचक कर
झाँकते चेहरे।
धार पर फिसलते नन्हे ज्योति पुंज।
ये एक साथ इतनी पहचानों के अक्स
किसने बिखराए हैं साँझ के धुँधलके में।
दो
पश्चिमी क्षितिज से ढरकती हुई साँझ
डूब रही गंदुमी अँधेरों में।
रिस-रिस कर छीज रही ज्योति किरन
ऊपर उभरता हुआ चन्द्रमा चतुर्थी का।
ज्योति पर ज्योति के हावी होने की
दुरभिसन्धि किस राहु की है।
तीन
कलश अरुणिम ज्योति का छलका,
उषा क अरुणिमा पीताभ
उतरी फुनगियों से, फिर
नही की सतह पर बिखरी।
भोर के धुँधलकों से उभरती उजास कोख,
आगत है ज्योति-पुत्र, स्वागत है, स्वागत है।
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