अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
09.04.2007
 
बरसात के बादल
रमानाथ शर्मा

फिर आई बरसात आ गए काले बादल।

 

गर्मी ने जब जब झुलसी धरती की छाती

मौसम ने तब तब भेजी बादल को पाती।

गहरे सागर ने नदियों की सुनीं पुकारें

भेज दिए पर्वत की चोटी पर हरकारे॥

घर में बैठा सूरज बिजली लगी नाचने

बदली बाँधे घूम रही बूँदों की पायल।

फिर आई बरसात आ गए काले बादल॥

 

खेतों ने देखे जो हरियाली के सपने

जल्दी ही सच होंगे बन जाएँगे अपने।

धूल उड़ाती रहों की दुख भरी कहानी

गौरैया सुन चुकी बहुत आँखों भर पानी॥

आसमान अब इन्द्रधनुष के हाथ उठाकर

सभी दिशाओं की आँखों में देगा काजल।

फिर आई बरसात आ गए काले बादल॥

 

पेड़ों की डालों पर इतराएँगे झूले

गीत गुनगुनाएँगे बरबस बिसरे-भूले।

नदी किनारे पुरवाई बाँसुरी बजाकर

जब मन के हर तार छेड़ जाएगी आकर॥

रस की गागर से भरकर हर हाथ-आंजुरी

मनभावन सावन तब बजवाएगा मादल।

फिर आई बरसात आ गए काले बादल॥

 

हवा राह भूली जैसे ही बिजली चमकी

बूँदों के छूते ही धरती सोंधी गमकी।

टर-टर का संगीत मेढकों ने जब छेड़ा

वन के मोरों ने सतरंगी पंख बिखेरा॥

बौरायी जल-धार नदी को लगी सिखाने

अब क्या देर चलो सागर से मिलने पागल।

फिर आई बरसात आ गए काले बादल॥



अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें