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ISSN 2292-9754

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03.23.2017


बनारस

बनारस अपनी प्राचीन संस्कृति की
दुहाई देनेवाला निर्लज्ज संन्यासी नहीं,
न ही वह नेता है,
संस्कृति उसका अपना ही -
भोगा हुआ ख़ामियाजा है।

नेता न तो संन्यासी होता है,
न ही हया से उसका
कोई ताल्लुक़ बनता है।

बनारस तो अपनी नस-नस में,
रचा, बसा, रस है।

बनारस ठंडाई है,
हलकें तर करता है,
हलाक़ नहीं करता।

बनारस परंपरा है,
परंपरा का वजूद न बनता है,
न बनाया जाता है,
वह तो बना हुआ आता ही है।

उसे बार-बार बनाना,
और बनाकर बनाए हुए रखना,
उसके वजूद की हत्या है।


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