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ISSN 2292-9754

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08.02.2017


अपनी बात

भाग - 2

 बाबा के अलावा तीन और ऐसी विभूतियाँ हैं जिनके संस्मरणों ने मुझे यह उपन्यास लिखने के लिए उकसाया है। रिश्ते में मेरे एक चचेरे भाई थे - तारा पण्डित। स्वभाव ऐसा अक्खड़ कि ज़िन्दगी का उनका जोड़-घटाना हमेशा ही उल्टा रहा। ठोस क़द-काठी थी पर टाँगें बस डेढ़ अदद। बचपन में जामुन के पेड़ से क्या गिरे सारी ज़िन्दगी ही उस एक हादसे का शिकार हो गई। बाबा बताते थे, “अरे ई तारा बड़ा गोरा-चिट्टा, बलवान और सुघर लड़का था। जामुन के पेड़ से गिरा नहीं कि सब कुछ बदल गया।“

तारा भाई की काठी ताउम्र मज़बूत रही। ऐसा शायद इसलिए भी कि सारी ज़िन्दगी छुट्टा सांड़ बने घूमते रहे। टाँग आधी थी इसलिए शादी नहीं हुई और शादी नहीं हुई तो ज़िम्मेवारियों का बोझ कैसे कन्धे चढ़ता। खेत था नहीं कि खेती करते। पर जीविका के लिए कुछ न कुछ तो करना ही था। तारा भाई के लिए यह “कुछ न कुछ” करनेवाली बात निहायत बाध्यता के स्तर पर पहुँचकर ही असरदार हो पाती। मसलन कुछ न कुछ करनेवाली यह बात बाध्यता के निहायती स्तर पर तब तक नहीं पहुँच पाई जब तक “मतारो” उर्फ़ इनकी माँ ज़िन्दा रही। उनके मरते ही भाई को लगा कि अब “कुछ न कुछ” करना ही होगा। करना भी क्या था - ले-दे कर अहीरों की संगत में जानवरों की कुछ अच्छी समझ हो गई थी। दूसरों को गाय-बैल ख़रीदवाते फिरते थे अब अपनी ख़ुद की ख़रीद-फ़रोख़्त करने लगे। फ़ायदा होता दीखता तो जल्दी-जल्दी कई जानवर एक बार ख़रीद लेते और दो-चार दिन बाद बेच देते। कुछ महीना दो महीना रखते। अगर जेब में कुछ अच्छी सी रक़म होती तो एक-आध अच्छी गाय या भैंस लाते, कुछ दिन पोसते, और अच्छी रक़म बनाते।

उदर भरना तारा भाई का व्यसन था; काम करना उनकी लाचारी थी। भगवान ने तेवर और ज़बान दोनों ही तेज़ दे रखे थे। हिम्मत के मामले में तो भगवान भी उनसे डरता था। वैसे उनके लिए काला अक्षर तो भैंस की ही अहमियत रखता था पर उनकी प्रतिभा थी बड़ी ही कारयित्री। इस प्रतिभा की बानगी देखने को मिलती थी उनकी उन भोजपुरी गालियों में जिनमें आदमी और पशुओं के नित-नूतन सम्बन्धों की रंगीनी एक विशेष अदा से उभरती थी। पशुओं की उनकी पहचान भी तो ग़ज़ब की थी। ले-देकर ऊपरवाले ने तारा भाई को बड़ी फ़ुरसत में बनाया था। उनकी भाषा और गालियों में आग और आँच का सम्बन्ध था।

यह आँच अपनी पूरी जवानी पर तब होती जब आस-पास दसईं की बीबी उर्फ़ दसईं

बो होती। दसईं कुंजड़ा था, और अगर दो-दो चार होते हैं तो दसईं बो कुंजडि़न थी। कहनेवाले कहते हैं कि यह कुंजडि़न कभी भी एक खूँटे से बँधकर नहीं रही। हमेशा बगटुट बवण्डर बनी गाँव-घर गली-मुंडेरे उड़ती फिरी। तारा भाई इसे नीमचढ़ी तितलौकी कहते थे। नई-नवेली व्याह कर आई थी तब भी इतनी ही तेज़ थी। इसकी सास बेचारी तो बहू बनकर रह गई। और दसईं? बेचारा सारी उमर चिड़ी का गुलाम बन कर रह गया। दसईं बो को मैं अपने बचपन से ही जानता आया हूँ। मुझे याद है कि कैसे उसे देखते ही मैं बच्चों का गोल बाँधकर पिल पड़ता था : दसईं के दस बेटा एक बेटा भुअरा। दसईं बन्हाइल बाड़े रामजी के दुअरा। दूसरे बच्चे अगर चिढ़ाते तो दसईं बो अगिया-बैताल बन जाती। गालियों के ऐसे फव्वारे छोड़ती कि राह-घाट सब सरोबार। यह मेरे परिवार का ही रुतबा था जिसके चलते मुझे कोई गाली नहीं दे सकता था। डाँट-फटकार भी मुझे कम ही मिलती थी। जब दसईं बो बहुत नाराज़ होती तो जाकर मेरी माँ से शिकायत करती और रोती। घर लौटने पर मेरी अच्छी ठुकाई होती।

एक बार मार के डर से भाग रहा था तो चौखट से टकरा गया। गिरते ही नाक लहू-लुहान हो गई। दूसरे दिन भी नाक काफ़ी सूजी हुई थी और दर्द भी ज़्यादा था। लिहाज़ा उस दिन दसईं बो को देखा तो छेड़ने की हिम्मत न कर सका। मेरे साथियों ने मेरी ओर देखा पर मैंने अनदेखा ही कर दिया। दसईं बो जानती थी कि मेरे घर के सामने से गुज़रने पर उसका स्वागत होना ही था। पर यह क्या? यह बन्दरी सेना आज चुप क्यों है? मेरे नज़दीक पहुँची तो मामला साफ़ हो गया। मुझसे पूरी हमदर्दी दिखाई और पूछा- यह क्या और कैसे हुआ? तारा भाई वहीं अपने घर के सामने गाय की सींगों मे तेल मल रहे थे। सुनते ही फट पड़े- “ख़ुद आँखें खोदी और अब पूछ रही है आँसू क्यों बह रहे हैं। कल जाकर चाची से जो जोड़ आई थी उसी का नतीजा है यह।> अब दसईं बो तारा भाई से उलझ गई और उनकी लड़ाई काफ़ी देर तक चलती रही। लड़ाई ख़त्म होने पर दसईं बो मुझ पर एक मीठी निगाह फेंक कर चलती बनी। उस दिन के बाद अनगिनती बार उसे चिढ़ाया होगा पर घर आकर मार कभी नहीं खाई। दसईं बो ने शिकायत करना ही छोड़ दिया था। हाँ, जब कभी मुझसे बहुत परेशान हो जाती तो ज़बदर्स्ती मुझे सबके सामने नंगा कर देती। मुझे यह निहायत अपमानजनक लगता था और दसईं बो को जैसे मेरा सरे बाज़ार नंगा किया जाना एक अनोखा बदला सा बनकर रह गया था। बचपन के दिनों की बस इतनी ही याद है। मैं बड़ा हुआ तो दसईं बो बूढ़ी हो गई थी। पर अभी भी ग़ज़ब की तेज़ी थी उस औरत में। मैं अब उससे नहीं बोलता था - बोलने पर ही कभी-कभी एकाध बात कर लेता था। मेरे घर फल-सब्जी बेचने या फिर काली-पूजा का चन्दा उगाहने वह अक्सर ही आती थी। वैसे पिछले छह-सात साल से वह बिलकुल सधुआ गई थी। अब उसका सारा समय काली-पूजा में ही बीतता था। वह इधर काफ़ी “खेलने” भी लगी थी। पर चूँकि गाँव के सावर्जनिक काली-थान पर अभी भी ऊँची जाति की औरतों का प्रभुत्व था और वे दसईं बो को - भले ही उसके ऊपर काली की साक्षात् सवारी ही क्यों न आई हो - पूज्य नहीं मान सकती थीं- दसईं बो ने अपने आँगन में ही एक काली-थान बना लिया था। वह यहीं रात के पिछले पहरों तक अपना दरबार लगाती। आनेवाली औरतें अक्सर छोटी जात की ही होतीं। गाहे-बगाहे बड़ी जातिवाली एकाध भी पहुँचती - पर कम।

काली पूजा के बारे में मेरी माँ की राय लेने या फिर चन्दा माँगने दसईं बो मेरे घर अक्सर ही आती। अब उसने मज़ाक और तीखी भाषा का प्रयोग लगभग छोड़ सा दिया था। मैं “लगभग” शब्द का प्रयोग इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि वह कभी-कभी अपने पुराने मूड में भी आ जाती थी। मैं उससे बहुत कम बोलता था। इसके दो कारण थे, एक तो यह कि कहीं मेरी माँ या पत्नी के सामने कुछ ऊलजलूल न बकने लगे और दूसरे यह कि काली-पूजा प्रसंग में उसके “खेलने” के प्रति मेरी कोई सहानुभूति नहीं थी। बहुत पहले उसने मेरे साथ देवर का मधुर रिश्ता बना लिया था। वैसे यह था इकतरफ़ा रिश्ता पर इससे उसे कुछ सुविधाएँ मिल गईं थीं। मसलन वह मेरे साथ मज़ाक कर सकती थी। मेरी माँ को सास जी कह कर अपनी कई बातें भी मनवा सकती थी और कभी-कभी प्यार में ही सही मेरी पत्नी को भी दो-चार सुना सकती थी। उसके मज़ाक बड़े ही फूहड़ और भदेस होते थे। मुझे तो पसीना छूटने लगता। हाँ, मेरी पत्नी को मेरी इस दयनीय हालत पर बड़ा मज़ा आता। कभी-कभी तो माँ अगर पास न हों तो मेरी पत्नी दसईं बो को उकसा देती। जब दसईं बो चालू हो जाती तो मेरी पत्नी हँसी रोकने के लिए आँचल का छोर मुँह में ठूँसे एक कोने खड़ी तमाशा देखती।

दसईं बो का जवाब तो तारा भाई ही थे - सेर पर सवा सेर। दोनों एक-दूसरे पर छीटाकशी करते। तारा भाई उसे देखते ही पूछ पड़ते - “अरे आज बिल्ली कहाँ मलाई मारने चली?” दसईं बो पटाख़ा सी फूट पड़ती - “चाह तार कि ऊहो टंगरी जामुन खाए चलि जाउ।“ तारा भाई तिलमिला उठते। अगर उन्हें कोई दो-चार डण्डे मार लेता तो शायद उन्हें उतनी चोट न लगती। टूटी टाँग और चर्चे जामुन के - तारा भाई यह बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। पर आ बैल मुझे मार भी तो उन्होंने ही किया था न? जब ओखली में सिर दे ही दिया तो मूसलों की चोट गिनने का क्या तुक। लिहाज़ा वे भी फट पड़ते। “सौ चूहा खा के ई बिल्ली भगतिन हो गई है। हई ना देखिए साहब, ई रण्डी सारी जिनिगी जो भी सामने पड़ा लीलती रही अउर अब बीना-बराया ढूँढ रही है।“ "चाह तारे कि आज सवेरे सवेरे हम तोरे रमाएन बांची।" दसईं बो तीर चढ़ी कमान बन जाती- “आपन चरित्तर काहें नइख देखत ए लंगड़! जिनिगी बीत गइल बाकी हाड़े हरदी ना चढ़ल। तरसते रहि गइल कि कवनो लहंगा पसारिति।“ तारा-दसईं बो पुराण सम-विषम काफी देर ऐसे ही चलता। एक से एक रसीले-चुटीले डायलाग चलते - कुछ तो ऐसे रसमय कि लिखने में भी संकोच होता है। पर पिछले दो-तीन सालों से दसईं बो के साथ अपने संबन्धों को जीवित रखना मेरे लिए एक ज़रूरत बन चुका था। हाँ, इसलिए कि दसईं बो गाँव-घर के नए-पुराने इतिहास का चलता-फिरता म्यूज़ियम थी। सच तो यह है कि अगर किरपाल बाबा, तारा भाई और दसईं बो जैसे लोग न होते तो क़िस्सागोई का यह दुस्साहस मैं कभी भी नहीं कर पाता।

ख़ैर अब आइए कथा की ओर। अपनी फ़ाइलों के सहारे मैंने अपने गाँव छाता उर्फ़ लहुरी काशी के चार-पाँच परिवारों की तीन-चार पीढ़ियों तक का क़िस्सा इस उपन्यास में बाँधने की कोशिश की है। घटनाएँ, ख़ासतौर पर तीसरी-चौथी पीढ़ीवाली, काफ़ी हद तक सही हैं। पहली-दूसरी पीढ़ी की घटनाएँ काफ़ी हद तक किंवदन्तियों से उभरी हैं और मेरी कल्पना का सहारा लेकर विकसित हुई हैं। जिन घटनाओं को मैं सही कह रहा हूँ -ख़ासतौर पर उनकी जिनकी सीधी जानकारी मुझे नहीं - हो सकता है कि तारा भाई, दसईं बो, या किरपाल बाबा ने उन्हें कुछ तोड़ा मरोड़ा भी हो। वैसे इसकी संभावना बहुत कम है। ये तीनों ही अपनी तमाम ख़ामियों के बावजूद सोलह आने-सौ फ़ीसदी खरे इनसान थे। सचाई का ही तकाज़ा था कि उन्होंने मुझसे पात्रों के नाम बदल देने की सिफ़ारिश की थी। बहुत से पात्र तो अभी कुछ साल पहले तक जीवित रहे। बहुतों की सन्तानें अभी भी जीवित हैं। किरपाल बाबा, तारा भाई और दसईं बो ने अपने असली नाम का प्रयोग करने की छूट मुझे दे रखी थी।

- क्रमशः


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