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05.03.2012
 
मृत्यु - कुछ क्षणिकाएँ
डॉ. रमा द्विवेदी

१.
आधुनिक लोग,
सहूलियत ढूँढते हैं,
इसलिए ही,
किसी अपने के मर जाने पर,
श्मशान नहीं,
क्रेमीटोरियम ढूँढते हैं।
.
श्मशान तक अर्थी लेजाने तक,
अपनो के कंधों का साथ तो होता था,
किंतु आज, एम्बुलेंस बुलवाकर,
किराए के आदमियों द्वारा मुर्दे को उठवाकर,
एम्बुलेंस में डलवाकर,
क्रेमीटोरियम में भस्म करने के लिए,
अपनो का साथ कहाँ होता है?
.
आधुनिक मशीन से,
अपने किसी प्रिय का शवदाह,
और फिर उसकी भस्म की सच्चाई,
अनिश्चितता की संभावना,
इंसान लापरवाही का पुतला जो है।
.
अस्थियाँ चुनना,
परम्परा मात्र नहीं,
इससे जुड़ी थी आस्थाएँ,
आत्मीयता, स्नेह,
उस दिवंगत के प्रति।
जब कोई अपना
सयंम, शुद्ध मन से आकर,
अस्थियाँ चुनता था,
तब मृतक की आत्मा को,
गहरा संतोष होता होगा कि-
उसके अपने, उसके लिए,
इतना तो कर रहे हैं,
तेरह दिन का कर्मकांड,
दिवंगत की आत्मा तृप्त होकर,
अपनी अगली यात्रा आरंभ करती है।
.
विज्ञान की प्रगति ने,
संवेदनाओं की दिशा,
मोड़ दी है,
या यूँ कहें मनुष्य संवेदनशील तो है,
किन्तु अपने लिए,
अपनो के लिए नहीं,
इसलिए वह वही करता है,
जिससे उसे लाभ हो या उसे सुख मिले,
उसने हर मुश्किल काम के,
उपाय ढूँढ निकाले हैं,
इसलिए ही तो अपने किसी प्रिय का शवदाह,
श्मशान के कठिन विधिविधान से नहीं,
क्रेमीटोरियम में करते हैं।
.
लद गए वे दिन, जब
चंदन किसी अमीर की लाश
जलाने के काम आता था,
आज तो लोग चंदन रहना चाहते हैं,
इसलिए शव को श्मशान में नहीं ,
क्रेमीटोरियम में जलाना चाहते हैं।
,
अब गम का मरहम,
उदासी, खमोशी या
आँसू बहाना नहीं,
टेलीविजन अब
मातम तक का
मरहम बनगया है।
.
न्युक्लियर परिवार में
मातम के समय पर भी,
कुछ ढाढस, कुछ सहानुभूति या
आत्यीयता के कुछ शब्द,
अब हमारे पास बचे कहाँ हैं,
सिवाय इसके,
टेलीविजन देखकर,
एक दूसरे से नज़रें चुराने के सिवा।
.
हर परम्परा और ,
रीति-रिवाज का अब
सरलीकरण हो गया है,
इसलिए ही तो
अपने प्रिय के शव को भी,
कंधे पर उठाकर,
श्मशान तक ले जाने का सफ़र,
पैदल नहीं,
गाड़ियों से तै हो गया है।
१०.
ऐसे भी लोग देखें हैं हमने,
गए थे मातम को बाँटने,
घंटी बजाई,
दरवाजा खुला देखा,
सामनेवाले टी.वी. देखने में व्यस्त हैं।
११.
कैसी विडम्बना है,
पिता की अथाह संपत्ति,
पाने के लिए,
कुत्ते-बिल्ली से लड़ते हैं,
और उनकी तस्वीर पर,
चंदन का हार डालकर,
अपने हृदय के उदारीकरण की
इतिश्री कर देते हैं।


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