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| 09.23.2007 |
| अपना नहीं कोई है डॉ. रमा द्विवेदी |
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सूना है मन का आँगन, अपना नहीं कोई
है, गिरती है पर्वतों से, सरपट वो दौड़ती
है, बदरी की बिजुरिया सी, अम्बर की
दुलहनियाँ सी, चन्दा की चाँदनी सी, तारों की
झिलमिली सी, बाहों में प्रिय के आके हर दर्द भूल
जाती, इक बूँद के लिए ही बनती है वो
दीवानी, |
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