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| 01.17.2009 |
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भूमण्डलीकरण के द्वन्द्व में पिसती ग्रामीण अर्थव्यवस्था |
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"पत्थर
उबालती रही एक माँ तमाम रात
बच्चे
फरेब खा के चटाई पर सो गये
इस
देश में परियों की कहानी भी खूब है
बच्चे
को आज उसन फिर भूखा सुला दिया
हमारा देश
प्राकृतिक सम्पदाओं से भरपूर है और हमारे युवा मानव संसाधन के क्षेत्र में
अमेरिका-ब्रिटेन जैसे विकसित देशों तक अपनी सफलता की पताका फहरा रहे हैं,
फिर भी आम आदमी उपेक्षित है। गाँवों के कल्याण के लिए तमाम योजनाएँ बनाई गई,
पर
राजनैतिक-प्रशासनिक इच्छाशक्ति के अभाव में वे अपने अंजाम तक नहीं पहुँच
सकीं। 1962 में लोकसभा में गाजीपुर के सांसद विश्वनाथ सिंह गहमरी ने पूर्वी
उत्तर प्रदेश में व्याप्त गरीबी की दास्तान सुनाते हुए कहा कि वहाँ गरीब
गोबर से अनाज का दाना निकाल कर खाने को मजबूर हैं,
तो
नेहरू की आँखें भी छलक आयी थीं। शायद इसी विडम्बना पर कविवर धूमिल ने लिखा
था-
“भाषा
में भदेस हूँ,
कायर इतना कि उत्तर प्रदेश हूँ।”
प्रधानमंत्री रहते हुए राजीव गाँधी ने भी स्वीकारा था कि केन्द्र से भेजे
गए एक रूपए में से मात्र 15 पैसा ही अंतिम व्यक्ति तक पहुँचता है। स्पष्ट
है कि सारा धन भ्रष्टाचार के नाले में जा रहा है। आजादी पश्चात सरकारों की
प्राथमिकता में शहरों का ही विकास रहा। गाँवों की कीमत पर शहरों को हर तरह
की सुख-सुविधाओं से भरपूर करना एक तरह का आन्तरिक उपनिवेशवाद ही कहा जायेगा,
जिसने तमाम समस्याओं को जन्म दिया। भूमण्डलीकरण के बहाने तमाम बहुराष्ट्रीय
कम्पनियाँ गाँवों तक पहुँच रही हैं और परम्परागत कृष व्यवस्था पर चोट कर
रही हैं। जो किसान अपनी आजीविका के लिए कृष कार्य करता था,
उसे परम्परागत खेती छोड़कर बागवानी और अन्य नकदी फसलों की खेती करने के लिए
लालच दिया जा रहा है। दूसरों के लिए ठेके पर खेती की इस प्रवृत्ति को बढ़ाने
के कारण गेहूँ की पैदावार लक्ष्य से पीछे खिसकने लगी और नतीजन विदेशों से
गेहूँ का आयात हो रहा है। किसानों को अपनी मनपसन्द फसल उगाने की बजाय रिटेल
स्टोरों में बेचने के लिए उत्पाद पैदा करने को कहा जा रहा है। ठेके पर
लहलहाती फसल चौपट हो जाती है तो किसानों की पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं होता।
विशेष आर्थिक क्षेत्र के नाम पर कम दामों में किसानों की जमीन लेकर एक तरह
से उन्हें पलायन के लिए मजबूर किया जा रहा है। स्पष्ट है कि बहुराष्ट्रीय
कम्पनियों के लिए किसान नागरिक नहीं उपभोक्ता है।
भूमण्डलीकरण के इस दौर में
‘कल्याणकारी
राज्य’
की
अवधारणा गौण होती गई। गाँवों में बसने वाले किसानों,
मजदूरों,
शिल्पकारों को सरकार ने उनके भाग्य पर छोड़ दिया। बढ़ती महगाई और बेरोजगारी
के बीच जैसे-जैसे अमीरी-गरीबी का फासला बढ़ता गया,
वैसे-वैसे किसानों की आत्महत्या,
भुखमरी से मौत और सामाजिक विषमता जैसी प्रवृत्तियाँ ढ़ती गईं। नेशनल
क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आँकड़ों पर गौर करें तो देश में वर्ष 2002 तक औसतन
हर 30 मिनट में एक किसान ने आत्महत्या की। वर्ष 2005 मंख 17131,
वर्ष 2006 में 17060 तो 1997 से 2006 के बीच कुल 78737 किसानों ने
आत्महत्या की। तस्वीर का सबसे दुखद पहलू तो यह है कि ज्यादातर आत्महत्या
करने वाले किसान समृद्ध प्रान्तों के हैं। अकेले महाराष्ट्र में वर्ष 1995
से अब तक 36428 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। ग्रामीण विकास मंत्रलय की ही
एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग दो करोड़ लोग जमीन से बेदखल किये जा चुके हैं और
इनमें से मात्र 54 लाख लोगों को ही पुनर्स्थापित किया गया है।
‘स्पेशल
इकानामिक जोन’
किस प्रकार
‘स्पेशल
एलिमिनेशन जोन’
में तब्दील हो रहे हैं,
वह
महाराष्ट्र,
आन्ध्र प्रदेश,
कर्नाटक,
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे
‘सेज’
राज्यों में किसानों की आत्महत्या में 6.2 फीसदी की वृद्धि स्वयमेव दशार्ती
है।
सबसे बड़ा
अन्तर्विरोध तो यह है कि सरकार आर्थिक समृद्धि के गीत गा रही है जबकि देश
का एक बड़ा तबका इस समृद्धि से कोसों दूर है। सबको विकास की एक ही लाठी से
हाँकने के कारण जो अमीर हैं वे अमीर हो रहे हैं,
और
गरीब दिनों-ब-दिन गरीब हो रहा है। आधुनिक परिवेश में आर्थिक विकास की बात
करने पर भूमण्डलीकरण,
उदारीकरण और निजीकरण का चित्र दिमाग में आता है। संसद से लेकर सड़कों तक
जी.डी.पी. व शेयर-सेंसेक्स के बहाने आर्थिक विकास की धूम मची है और मीडिया
भी इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है। जिस देश के संविधान में लोक कल्याणकारी
राज्य की परिकल्पना की गई हो,
वहाँ सामाजिक विकास की बात गौण हो गई है। सरकार यह भूल रही है कि पूँजीवाद,
समाजवाद या अन्य कोई वाद मात्र साधन है,
साध्य नहीं। साध्य तो समग्र समाज के विकास में निहित है,
न
कि एक सीमित भाग के विकास में। यहाँ तक कि नोबेल पुरस्कार विजेता प्रख्यात
अर्थशास्त्री डॉ. अमर्त्य सेन ने भी भारतीय परिप्रेक्ष्य में इंगित किया है
कि - शिक्षा,
स्वास्थ्य,
आवास जैसी आधारभूत सामाजिक आवश्यकताओं के अभाव में उदारीकरण का कोई अर्थ
नहीं है। आर्थिक विकास में जहाँ पूजीपतियों,
उद्योगपतियों,
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों अर्थात राष्ट्र के मुट्ठी भर लोगों को लाभ होता है,
वहीं भारत का बहुसंख्यक वर्ग इससे वंचित रह जाता है या नगण्य लाभ ही उठा
पाता है। इस प्रकार ट्रिंकल डाउन का सिद्धान्त फेल हो जाता है। अतः सामाजिक
विकास जो कि बहुसंख्यक वर्ग की आधारभूत आवश्यकताओं के पूरी होने पर निर्भर
है,
के
अभाव में राष्ट्र का समग्र और चहुमुखी विकास सम्भव नहीं है। एक तरफ गरीब
व्यक्ति अपनी गरीबी से परेशान है तो दूसरी तरफ देश में
करोड़पतियों-अरबपतियों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है। तमाम
कम्पनियों पर करोड़ों रुपये से अधिक का आयकर बकाया है तो इन्हीं पूँजीपतियों
पर बैंकों का भी करोड़ों रुपये शेष है। डॉ. अमर्त्य सेन जैसे अर्थशास्त्री
ने स्पष्ट इंगित किया है कि समस्या उत्पादन की नहीं,
बल्कि समान वितरण की है। आर्थिक विकास में पूँजी और संसाधनों का
केन्द्रीकरण होता है जो कि कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के खिलाफ है। फिर
भी तमाम सरकारें सामाजिक विकास के मार्ग में अवरोध पैदा करती रहती हैं। जिस
देश की 70 प्रतिशत जनसंख्या नगरीय सुविधाओं से दूर हो,
एक
तिहाई जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे हो,
लगभग 35 प्रतिशत जनसंख्या अशक्षित हो,
जहाँ गरीबी के चलते करोड़ों बच्चे खेलने-कूदने की उम्र में बालश्रम में झोंक
दिये जाते हों,
जहाँ कृष आधारित अर्थव्यवस्था में हर साल हजारों किसान फसल चौपट होने पर
आत्महत्या कर लेते हों,
जहाँ बेरोजगारी सुरसा की तरह मुँह बाये खड़ी हो-वहाँ शिक्षा को मँहगा किया
जा रहा है,
सार्वजनिक संस्थानों को
औने-पौने दामों में बेचकर निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है,
सरकारी नौकरियाँ खत्म की जा रही हैं,
सब्सिडी दिनों-ब-दिन घटायी जा रही है,
निश्चततः यह राष्ट्र के विकास के लिए शुभ संकेत नहीं है।
सरकार
द्वारा जारी नेशनल सैम्पल सर्वे आर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट पर गौर करें तो
शहरी बनाम ग्रामीण का द्वन्द्व खुलकर सामने आता है। इसके अनुसार अभी भी
ग्रामीण आबादी का पाँचवा हिस्सा (लगभग 14 करोड़) मात्र 12 रूपये रोजाना में
जीवन जीने को अभिशप्त है। 19 फीसदी ग्रामीणों के पास अपनी रोजी-रोटी चलाने
के लिए सालाना 365 रूपये भी नहीं जुड़ते। गाँवों का पाचवाँ हिस्सा मिट्टी
से बनी दीवारों और छतों के नीचे रहने को विवश हैं तो 31 फीसदी ग्रामीण
बमुश्किल छत या दीवार में से किसी एक को पक्का करने का इन्तजाम कर पाये
हैं। उत्पादकता के बावजूद गाँव वाले 251-400 रूपये में भोजन का काम चला रहे
हैं जबकि शहरी क्षेत्रों में भोजन पर 451-500 रूपये मासिक खर्च किये जा रहे
हैं। इससे बड़ी विसंगति और क्या हो सकती है कि ग्रामीणों की आय का आधा से
ज्यादा हिस्सा अर्थात 1 रूपये में 53 पैसे भोजन जुटाने पर खर्च हो रहा है
जबकि शहरी बाबू लोग कमाई अधिक होने के बावजूद मात्र 40 पैसे खर्च कर रहे
हैं। सरकार भले ही बड़े-बड़े दावे करे और ग्रामीणों के नाम पर सब्सिडी जारी
करे,
पर
असलियत कुछ और ही है। ताम सब्सिडी के बावजूद रसोई गैस मात्र 9 फीसदी
ग्रामीणों के नसीब में है,
तीन चौथाई ग्रामीण आबादी अभी भी गोबर व सूखी लकड़ी पर निर्भर हैं। 42 फीसदी
ग्रामीण बिजली पर सब्सिडी के बावजूद अँधेरा दूर करने हेतु केरोसिन पर
निर्भर हैं। शहरी बनाम ग्रामीण का सबसे ज्वलंत उदाहरण उनकी व्यय शक्ति है।
शहरी भारत जहाँ हर माह 1171 रूपये खर्च कर रहा है,
वहीं ग्रामीण भारत मात्र 625 रूपये। यह स्थिति सन्तोषजनक नहीं कही जा सकती।
ऐसे में आर्थिक विकास के साथ-साथ आर्थिक विषमता की चौड़ी होती खाई को भी
पाटना जरूरी है क्योंकि करोड़ों लोगों को फटेहाल रख कर राष्ट्र की समृद्धि
का सपना नहीं देखा जा सकता। राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ सर्वेक्षण के
आँकड़े गवाह हैं कि दुनिया की सबसे विशाल खेती व राशन प्रणाली की इतनी मजबूत
व्यवस्था होने के बावजूद आज देश में 33 फीसदी वयस्क और तीन वर्ष से कम उम्र
के 46 फीसदी बच्चे कुपोषण के शकार हैं। हालात यह हैं कि नेपाल,
बांगलादेश व अफ्रीकी राष्ट्र भी इस मामले में हम से बेहतर हैं। एक तरफ इस
बात पर जश्न कि भारत के मुम्बई स्टाक एक्सचेंज व नेशनल स्टाक एक्सचेंज
दुनिया के शीर्ष बारह शेयर बाजारों में शुमार हो चुके हैं,
और
वर्ष 2007 में भारत में करोड़पतियों की संख्या बीते वर्ष के एक लाख से
बढ़कर 1,23,000 हो गई है,
जो
कि दुनिया में सर्वाधिक वृद्धि है,
दूसरी तरफ उपरोक्त दशार्यी गई स्थिति स्वयमेव भूमण्डलीकरण व उदारीकरण के
अन्तर्द्वन्द को स्पष्ट कर रही है। स्वतंत्र्ता की स्वर्णजयंती की पूर्व
संध्या पर अपने उद्बोधन में तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर.नारायणन के शब्द
हमें समाज का चेहरा दिखाते हैं-
“उदारीकरण
से उपजी विषमता यूँ ही बढ़ती रही और धन का अश्लील प्रदशर्न जारी रहा तो
समाज में सिर्फ अशांति फैलेगी। उथल-पुथल की इस आँधी में सिर्फ गरीब की
झोपड़ी ही नहीं उड़ेगी,
अमीरों की आलीशान कोठियाँ भी उजड़ जाएँगी।”
अमेरिका
के चर्चित विचारक नोम चोमस्की ने भी हाल ही में अपने एक साक्षात्कार में
भारत में बढ़ते द्वन्द्व पर खुलकर चर्चा की है। चोमस्की का स्पष्ट मानना है
कि भारत में जिस प्रकार के विकास से आर्थिक दर में वृद्धि हुयी है,
उसका भारत की अधिकांश जनसंख्या से कोई सीधा वास्ता नहीं दिखता। यही कारण है
कि भारत सकल घरेलू उत्पाद के मामले में जहाँ पूरे विश्व में चतुर्थ स्थान
पर है,
वहीं मानव विकास के अन्तर्राष्ट्रीय मानदण्डों मसलन,
दीर्घायु और स्वस्थ जीवन,
शिक्षा,
जीवन स्तर इत्यादि के आधार पर विश्व में 126 वें नम्बर पर है। आम जनता की
आर्थिक स्थिति पर गौर करें तो भारत संयुक्त राष्ट्र संघ के 54 सर्वाधिक
गरीब देशों में गिना जाता है। संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास रिपोर्ट की
मानें तो जैसे-जैसे भारत की विकास दर में वृद्धि हुयी है,
वैसे-वैसे यहाँ मानव विकास का स्तर गिरा है। आज 0-5 वर्ष की आयुवर्ग के
भारतीय बच्चों में से लगभग 50 फीसदी कुपोषत हैं तथा प्रति 1000 हजार नवजात
बच्चों में 60 फीसदी से ज्यादा पहले वर्ष में ही काल-कवलित हो जाते हैं।
स्पष्ट है कि उपरी तौर पर भारत में विकास का जो रूप दिखायी दे रहा है,
उसका सुख मुट्ठी भर लोग ही उठा रहे हैं,
जबकि समाज का निचला स्तर इस विकास से कोसों दूर ह।
अब समय आ
गया है कि गरीब,
किसान,
मजदूर,
दलित,
पिछड़े और आदिवासी वर्गों में व्यापक चेतना तथा जागरुकता पैदा की जाय जिससे
वे अपनी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सरकारों को बाध्य कर सकें। याद
कीजिए 1789 में पेरिस में हुई पहली राज्य क्रान्ति,
जहाँ लोग राजा से रोटी माँगने के लिए 18 कि.मी. दूर वर्साय तक पहुँच गये
थे। अमेरिका में अश्वेतों के लिए ऐतिहासिक मार्च कर मार्टिन लूथर किंग
जूनियर ने 1963 म सफलता अर्जित की तो भारत में गाँधी जी ने जनादेश यात्रओं
के दम पर अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया। इस परम्परा को
समय-समय पर आजमाया गया। हाल ही में 2 अक्टूबर 2007 को ग्वालियर से चलकर 18
राज्यों के लगभग 27000 भूमिहीन किसानों
ने जब दिल्ली में बैठे हुक्मरानों को अपनी आवाज सुनाने के लिए तीन
हफ्ते तक 400 कि.मी. लम्बा अहिंसक मार्च करते हुए 28 अक्टूबर को दिल्ली के
रामलीला ग्राउण्ड पर प्रवेश किया,
तो
ऐसा लगा जैसे ये अपने ही देश में बेगाने हैं। जमीन,
जल
और जंगल पर अपने अधिकारों की माँग कर रहे इन वंचितों के पास अपने दमन की
अद्भुत दास्तान है। वस्तुतः सामन्तवादी समाज और पूँजीवादी व्यवस्था के
लोकतांत्रिक मूल्यों से टकराव का दुष्परिणाम छोटे किसानों,
मजदूरों,
अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को ही प्रायः भुगतना पड़ा है। यह इस बात
का भी परिचायक है कि 9 प्रतिशत से ज्यादा की आर्थिक विकास दर और सेंसेक्स
की उँचाइयों के साथ विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना देखने से पहले
सामन्तवादी मूल्यों में जकड़े समाज की मुक्ति का मार्ग भी ढूँढना होगा।
स्वयं रिजर्व बैंक के गर्वनर वाई.वी. रेड्डी ने चेतावनी दी है कि 9 प्रतिशत
सालाना की विकास दर भारत के खेतिहर और गैर-खेतिहर परिवारों के बीच मौजूद
विषमता को और बढ़ा देगी।
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