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ISSN 2292-9754

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02.20.2016


उलझन

उलझ रहा जितना जीवन में, पल पल उतना सुलझ रहा हूँ

अहा! उलझन तुम हो धन्य
तुमसे प्रिय है न कोई अन्य

पग पग पर काँटों को सजा
फूलों का पुंज लिए विकल
लगती कुरूप हो वेदना सी
मगर अंतस सुंदर सकल
कंचन सम तन निखर रहा, तुम संग जितना सुलग रहा हूँ
उलझ रहा जितना जीवन में, पल पल उतना सुलझ रहा हूँ

यह भी कृपा रही तिहारी
रिश्तों की वह चार दीवारी

एक पल में ही जान गया
कौन अपना कौन पराया
कौन पथ का सच्चा साथी
कौन भीतर गरल समाया
मोती सारे बन गए आँसू, तव आँचल जितना सुबक रहा हूँ
उलझ रहा जितना जीवन में, पल पल उतना सुलझ रहा हूँ

पौरुष की पहचान जान ली
तन की सारी ख़ाक छान ली

तुम न होती तो कैसे में
ख़ुद को ही पहचान पाता
तुम बिन कैसे? बोलो! मैं
अपनी जय के गान गाता
नव पल्लव सा पनप रहा, तव रश्मि जितना झुलस रहा हूँ
उलझ रहा जितना जीवन में, पल पल उतना सुलझ रहा हूँ


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