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ISSN 2292-9754

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02.20.2016


सपनों का घर

भोर का दिनकर रश्मि अपनी भेजे जब वसुधा पर
या पूनम के चाँद की ज्योति पहुँचे जब अनुजा पर
दोनों किरणें विरल प्रतीक हैं जीवन के उत्थान की
सत्य सबक है मानुस हेतु स्वप्न महल निर्माण की
विनती प्रभु है तुमसे मेरी, मम जीवन भी कुछ सुधरे
धरती पर यह किरणें दोनों मेरे घर से हो गुज़रें

अस्ताचल का सूरज जब थक कर सोने को निकले
या चिंता का दानव जब जीवन की इच्छा को निगले
आवश्यकता है उस समय मिलकर के धैर्य बँधाने की
अंधकार में आशा का कोई दैदीप्य पुंज जलाने की
अमृत सबको देकर ले लूँ नील हलाहल दामन में
अभिलाषा है मेरी उत्कल वह हवन हो मेरे आँगन में

दोपहरी का सूरज जब भी बाण अगन के बरसाए
या प्यासा कोई मरुथल में जल भेषज हेतु अकुलाए
सबकी व्यथा सुन लूँ मैं, सबकी आधि मैं हर लूँ
सबके जीवन की झोली खुशियों के पुष्पों से भर लूँ
जीवन का कर्तव्य निभावन इससे बढ़कर क्या होगा
सपनों का आलय तुम बोलो इससे बेहतर क्या होगा


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