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ISSN 2292-9754

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06.17.2016


ज्योति छत पर उतर आई

एक रात हुई, एक चाँद खिला, ज्योति छत पर उतर आई
मची अंतरिक्ष में हलचल, बादल संग यह ख़बर आई

दिन का थका व्याकुल दिनकर क्षितिज पार चलने को है
उस पार भी कोई रश्मि के आँचल में पलने को है
इस पार मैं अब रह गया हूँ चिंतित अनमना अकेला
पूछता हूँ शबनम से कब सूर्य उदय होगा नवेला
उड़ जाओ भ्रमर कह दो ऋतु से गुलशन में उजर छाई

बंध पुराने टूट गए नव परिभाषाएँ गढ़ने को
कुछ नवल गीत रचने होंगे नव आशाएँ पढ़ने को
अब सागर से नदियों में जल लाने की तैयारी है
यमुना तट पर कोई राधिका अब तलक दुखियारी है
उन्हीं कहारों के संग संग मन डोली नैहर आई

कुछ अनुबंधों पर सहमत हो फूल खिले हैं डाली पर
कुछ काँटों की नस्लें फिर से खड़ी हुई रखवाली पर
उजली सी दिख है पड़ी थी रात की चादर जो मैली
मचल उठी खग की तरंगे देखकर इक नई सहेली
कलरव गुंजित मधुमय विटप जब उषा किरण नज़र आई

एक रात हुई, एक चाँद खिला, ज्योति छत पर उतर आई
मची अंतरिक्ष में हलचल, बादल संग यह ख़बर आई


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