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ISSN 2292-9754

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12.28.2018


बिगड़े काम भी ईश्वर की कृपा बन जाते हैं

बात सन 1990 की है मई महीने का कोई दिन। मिर्जापुर उत्तर प्रदेश जिले के गाँव में एक राष्ट्रीयकृत बैंक की शाखा में मेरी तैनाती थी। मैं उसी गाँव में ही रहता था। बैंक की शाखा जिस बिल्डिंग में थी वह व्यंकटेश्वर पांडे जी की है। उन्हीं पांडे जी के पुराने घर में जो सड़क से लगभग एक फ़र्लांग उत्तर तरफ़ है उसी में उन लोगों ने एक कमरा मुझे दे रखा था। उसी में मैं रहता था। भोजन उनके साथ ही उनके घर में करता था। पांडे जी के ताऊ जी श्री केदारनाथ पांडे बहुत भले व्यक्ति थे। मैं उनके घर में परिवार के सदस्य की तरह 3 साल से ज़्यादा समय तक रहा। इस अवधि में उन लोगों के अलावा आस पड़ोस के लोगों से काफ़ी घनिष्ठता हो गई।

उन्हीं के परिवार के एक श्री आद्या प्रसाद पांडे थे। उनका बड़ा पुत्र पड़ोस के ही एक मिश्र जी की गाड़ी चलाता था, जो सवारियाँ ढोती थी। उसी लड़के की शादी थी। बारात सीधी जिले के किसी गाँव में जानी थी। मैं भी उस बारात में शामिल हुआ। बारात एक मिनी बस और दो जीप में गई। लगभग 50 किलोमीटर दूर हनुमना बाजार से बायीं तरफ़ सीधी ज़िले में किसी गाँव में हम लोगों को जाना था। गर्मी का दिन तेज़ धूप और ज़बरदस्त लू, पहाड़ी घुमावदार सड़क जिसकी एक और ख़तरनाक घाटियाँ। ऐसी सड़क पर लगभग 40 किलोमीटर दूर यात्रा करके हम लोग उस गाँव में पहुँचे जहाँ शादी होनी थी। हम लोग करीब 6 बजे शाम वहाँ पहुँच गए। काफ़ी दिन था, धूप बहुत कड़ी थी और लू भी चल रही थी। आद्या प्रसाद जी ने बारात जहाँ पर रुकने के लिए कहा वहाँ आम के 3-4 पेड़ थे। एक पेड़ के नीचे एक बड़ा सा घड़ा रखा हुआ था जो खाली था। पांडे जी ने बताया कि बारात वहीं पर रुकनी थी अर्थात् जनवासा वहीं पर था। पूछने पर दक्षिण पश्चिम दिशा में लगभग दो-ढाई सौ मीटर दूर खेतों के बीच खपरैल वाले कच्चे घर की ओर संकेत करते हुए उन्होंने बताया कि बारात उसी घर में जानी थी। सो, गाड़ियों पर से सामान उतारे गए। दरियाँ बिछाई गईं उन पर चाँदनी बिछाई गईं। उसमें बीच में वर-वधू से संबंधित सामान जिसमें स्टील का एक बॉक्स वधू के लिए सूटकेस व अन्य कुछ सामान व्यवस्थित तरीक़े से रखे गए। बाराती लोग इधर उधर खड़े होकर अपनी कमर पीठ पैर सीधे करने लगे, गप्पें करने लगे। खैनी खाने वाले सुर्ती चूना रगड़ने लगे। बीड़ी पीने वाले बीड़ी पीने लगे और गुटखा वाले पाउच को दाँतों से फाड़कर अँगूठे और उँगलियों से पाउच का मुँह वृत्ताकार करके मुँह में उलटने लगे, बिना देखे कि पाउच में है क्या। बारात के बाजे के नाम पर ब्रास बैंड, बड़े भोंपू वाला लाउडस्पीकर टेप वाले कैसेट से एंप्लीफ़ायर के मार्फ़त संगीत प्रसारित करने वाला यंत्र। उस यंत्र को और लाउडस्पीकर को विद्युत् शक्ति प्रदान करने के लिए 2 बैटरियाँ, रोशनी के लिए मिट्टी के तेल से जलने वाले दो हंडे।

इतना सब होने के बावजूद लड़की पक्ष से जब कोई नहीं आया तो समधी जी अर्थात् वर के पिता जी आद्या प्रसाद पांडे नाराज़ होने लगे। आखिरकार समधी थे। जिस घर को वह अपना समधियाना बता रहे थे और जिस घर में बारात जानी थी वहाँ पूरी तरह सन्नाटा था एक भी आदमी दिखाई नहीं दे रहा था; जबकि शादी ब्याह वाले घरों में भीड़भाड़ होती है, अंदर-बाहर सब जगह आदमी दिखाई देते रहते हैं; चहल-पहल रहती है। इसे लक्ष्य करके मैंने आद्या चाचा से पूछा कि चाचा बारात आज ही आना था न आपको। कहीं ऐसा तो नहीं कि आप पहले ही चले आए हो। बड़े बेटे की शादी में कुछ ज़्यादा ही उत्साह में आप पहले ही चले आए क्या।

उन्होंने कहा, "अरे नहीं मनीजर साहब लगन लिखी हुई है आज ही आना था।"

तो मैंने कहा, "तो आख़िर फिर क्या बात है। आप बता रहे हैं कि उसी घर में बारात लगनी है सामने। वहाँ तो एकदम सन्नाटा है कोई आदमी दिखाई नहीं दे रहा है। ऐसा भी कहीं होता है क्या?" मैंने केदार चाचा से कहा कि देख कर के पक्का करिए कि आज ही आना था ऐसा तो नहीं कि बड़े लड़के की शादी के उत्साह में आप पहले ही चले आए हों।

आनन-फानन लग्न पत्रिका निकाली गई उसके हिसाब से तो सही दिन बारात आई थी। इसके बाद आद्या चाचा बमकने लगे। परंपरागत समधी का रूप प्रदर्शित करने लगे। मैंने केदार चाचा से कहा कि अपने इन भाई साहब को समझाइए शांत रहे कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है उसका पता लगाया जाए तब आगे की कुछ सोचा जाए।

केदार चाचा ने आद्या प्रसाद जी को समझाया। मैंने कहा कि चाचा जी शादी ब्याह वाले घर में इस तरह सन्नाटा होना अस्वाभाविक स्थिति प्रदर्शित करता है। वहाँ कुछ ना कुछ तो गड़बड़ अवश्य ह॥ अगर आप लोग कहें तो वहाँ जाकर हम लोग पता लगाएँ। उनकी सहमति मिलने पर मैंने उनके बड़े पुत्र लाल बहादुर उर्फ़ लल्लू को साथ में लिया और खेतों के बीच में से होकर लड़की वालों के घर की तरफ़ दोनों लोग बढ़े। चलते-चलते मैंने लल्लू से कहा कि कुछ अप्रत्याशित ज़रूर हो गया है इस घर में। लल्लू ने कहा कि कुछ भी हो गया है आख़िर लड़की वालों को इधर ख़बर तो करनी चाहिए थी। इतने में हम लोग लड़की वाले घर के दरवाज़े पर पहुँच गए। खपरैल वाला कच्चा मकान उत्तर दक्षिण बना था। उत्तर तरफ़ दरवाज़ा और बाहर में लगभग 50 गुणा 70 फीट खुली जगह।

दरवाज़े के पास पहुँचकर लल्लू ने आवाज लगाई, "अरे भाई तिवारी जी घर में हैं?"

भीतर से एक सहमी हुई सी आवाज़ आई, "कौन है?"

लल्लू ने कहा कि बाहर आइए फिर बातचीत होती है। भीतर से एक सज्जन बाहर आए लगभग 45 वर्ष धोती कुर्ता पहने हुए बायें कंधे पर गमछा रखे हुए। बाहर आए तो मैंने उनको नमस्कार किया और पूछा कि क्या आज आप ही के यहाँ बारात आई हुई है। उन्होंने रुआँसे स्वर में जवाब दिया, "हाँ भैया।"

फिर लल्लू को पहचानते हुए उन्होंने उनको प्रणाम किया। लल्लू ने उन्हें मेरा परिचय दिया तो उन्होंने मुझे भी प्रणाम किया। इसके बाद मैंने उनसे पूछा कि कुछ गड़बड़ हो गई है क्या? आपके यहाँ तो बाहर भीतर सब जगह एकदम सन्नाटा है, लगता ही नहीं कि यहाँ कोई समारोह है।

वह बोले, "क्या बताऊँ भैया?" और आगे कुछ बोलने में असहाय से वह रोने लगे। मैंने सोचा कि लगता है आकस्मिक रूप से कोई बड़ी दुखद घटना हो गई है। उन्हें ढांढस बँधाते हुए मैंने कहा कि आप रोइये नहीं बताइए तो सही कि क्या हुआ। उसके बाद तिवारी जी ने जो कुछ बताया वह हम दोनों के लिए सर्वथा अप्रत्याशित था। हम यह समझने में एकदम असमर्थ रहे कि समाज के लोग इतने असामाजिक, क्रूर, इतने अमानवीय भी हो सकते हैं।

तिवारी जी की ससुराल उस गाँव में थी। उनके सास-ससुर की एकमात्र संतान थी उनकी पुत्री जिसके साथ तिवारी जी का विवाह हुआ था। तिवारी जी पुश्तैनी अत्यंत निर्धन किसान परिवार के पुत्र थे। उनके माता-पिता ने इसे सुअवसर जाना। परिणामत: संपत्ति के लालच में यह विवाह किया गया। और गौना होने के बाद ही तिवारी जी अपनी ससुराल में बस गए। तिवारी जी के ससुर कई भाई थे किसी को ऐसी अपेक्षा नहीं थी कि भाई अपने दामाद को घर-जमाई बना लेगा। लेकिन भाई ने जब ऐसा कर लिया तो अच्छी-ख़ासी संपत्ति हाथ से निकल जाने से सब लोग बहुत ही नाराज़ हुए। भाई लोग प्रभावशाली थे; गाँव में उनकी अच्छी पकड़ और दबदबा था। उन लोगों ने दाँवपेच करके तिवारी जी के ससुर और तिवारी जी को समाज से बहिष्कृत कर दिया। ससुर के ज़िंदा रहते ही तिवारी जी ने एक खेत में मकान बनवा लिया था। मकान खपरैल का था जिसका दरवाजा उत्तर तरफ़ था। सामने थोड़ी खुली जगह छोड़ कर सामने और अगल-बगल खेत थे। सास और ससुर शीघ्र ही परलोक सिधार गए। तिवारी जी के ससुर के पास संपत्ति अच्छी-ख़ासी थी, जिससे उनका गुज़र-बसर बहुत आराम से हो रहा था। तिवारी जी के रिश्तेदारों में उनकी एक बहन थी जो अल्पायु में ही विधवा हो गई थी और नि:संतान थीं। इस तरह तिवारी जी का घर-परिवार और नाते-रिश्तेदारी बहुत सीमित थी। उनके तीन बच्चों में सबसे बड़ी संतान लड़की थी; जिस का विवाह उन्होंने आद्या प्रसाद पांडे जी के लड़के के साथ तय किया था। बारात आने के दो-तीन दिन पहले तक 2-1 लोग उनके साथ थे; बाद में गाँव वालों ने दबाव डालकर यह स्थिति बना दी कि नाई, पंडित तक सब को उनके यहाँ जाने से मना कर दिया। तिवारी जी ने अपने सामर्थ्य के अनुसार विवाह की तैयारियाँ कीं थीं।

यह सब उनके मुँह से सुनने के बाद मैंने उनसे पूछा, "यह बताइए कि आप विवाह करेंगे कि नहीं?"

वह कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे। तब बातों का सूत्र मैंने अपने हाथ में लिया। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया की पर्याप्त गेहूँ पिसा लिया था उन्होंने। आलू, परवल और कद्दू पर्याप्त मात्रा में ख़रीद कर रखा था। चीनी ख़रीद कर ले आए थे। बारातियों के जलपान के लिए बर्फी और दालमोठ ले आए हुए थे। पूड़ी-कचौड़ी छानने के लिए घी की व्यवस्था कर ली थी उन्होंने। सुबह नाश्ते में आलू-बंडा और जलेबी का नाश्ता कराने का उनका विचार था।

तब मैंने कहा कि महाराज सारा इंतज़ाम तो आप किए हुए हैं। फिर चिंता किस बात की। ऐसा करिए कि हमें भी अपने घर का ही सदस्य समझिए। आपके बताने के हिसाब से आपके घर में आपकी पत्नी और आपकी बहन यही दो महिलाएँ होंगी। बड़ी बेटी की बारात आई हुई है, इसलिए ज़ाहिर है कि बाक़ी बच्चे छोटे ही होंगे। आप ऐसा करिए कि महिलाओं से हमारा परिचय करवा दीजिए। हम बारात लेकर आए हैं। आपकी लड़की का विवाह है। सब कार्यक्रम हँसी-ख़ुशी और विधि-विधान पूर्ण ढंग से संपन्न होना चाहिए। इसलिए हमारे बीच, आपस में किसी प्रकार का दुराव-छिपाव या पर्दादारी नहीं होनी चाहिए।

बहुत मुश्किल से दोनों महिलाएँ हमारे सामने आईं। हमने उन्हें ढांढस बँधाया और आश्वस्त किया कि हम बारात लेकर आए हैं विवाह करने के लिए। गाँव ने समाज ने जो भी आपके साथ किया वह सब वह लोग जानें। हम आपके साथ किसी प्रकार का कोई अन्याय नहीं करेंगे। इसलिए आप लोग हाथ-मुँह धो कर सुचित्त हो लें और विवाह की रस्म पूरी करने की तैयारी शुरू कर दें।

फिर हमने तिवारी जी से कहा, "आप भी हाथ पैर धोकर तैयार हो जाइए। बारात के स्वागत की तैयारी करिए। हम लोग जा रहे हैं सारा इंतज़ाम करते हैं आप एकदम निश्चिंत हो जाइए।"

उन सभी को असमंजस की स्थिति में छोड़ कर मैं और लल्लू जनवासे में वापस आ गए।

सारा वृत्तांत सुनने के बाद आद्या प्रसाद जी बमकने लगे। हमारे एरिया में एक रस्म जैसा है कि समधी अर्थात् लड़के का पिता बारात के दौरान गाहे-बगाहे वजह-बेवजह बमकता रहे। उसे ऐसा समझ में आता है कि इस आयोजन और कार्यक्रम का एकमात्र मालिक वही है। उसकी व्यक्त-अव्यक्त इच्छाओं का सम्मान करना और उसके इशारों पर नाचना लड़की पक्ष वालों का एकमात्र कर्तव्य है। सो वह परंपरागत समधी का रूप अख़्तियार करने लगे। उनके अंट-संट को थोड़ी देर तो हम लोग सुनते रहे। फिर लल्लू का पारा गरम होने लगा। लल्लू थे गर्म मिजाज़ आदमी। जब क्रोध में आते थे, हानि-लाभ, छोटे-बड़े की परवाह नहीं करते थे। चीज़ें उठाकर के पटकना, तोड़ना-फोड़ना शुरू कर देते थे; बिना इसकी परवाह किए कि नुकसान उन्हीं का हो रहा है। उनके इस रौद्र रूप से मैं परिचित हो चुका था इसलिए बातों का सूत्र मैंने अपने हाथ में लिया। मैंने केदार चाचा को संबोधित करते हुए कहा कि चाचा आप ही अपने भाई को समझाइए। नहीं तो यह गाँव वाले जो चाहते हैं वही होगा। यह चाहते हैं कि यह तिवारी कहीं मुँह दिखाने लायक़ ना रह जाए और इसकी बेटी की बारात लौट जाए। चाचा अगर ऐसा हो गया तो इन लोगों के सामने कुआँ, पोखरा, तालाब में डूब मरने के अलावा और कोई रास्ता बचेगा क्या? गाँव वालों और तिवारी जी के बीच में आज क्या दुश्मनी और मनमुटाव है यह तो हम नहीं जानते लेकिन यह तो आप भी मानेंगे कि वह लड़की इस गाँव के लोगों की भांजी, बहन, नातिन में से कुछ न कुछ ज़रूर लगती होगी। ग़ैर की लड़की की शादी में भी लोग कोई बाधा नहीं उत्पन्न करते; जहाँ तक हो सकता है कुछ सहायता ही करते हैं। यह गाँव वाले इतने क्षुद्र और निकृष्ट हैं कि ऐसी गिरी हुई हरकत कर रहे हैं! आप लोग बारात लेकर आए हैं तो इसका मतलब आप लोगों ने तिवारी जी को अपना रिश्तेदार मान लिया है और उनकी बेटी को अपनी बहू मान लिया है। जो स्थिति सामने है उस पर मैं तो आप लोगों को कहूँगा बल्कि प्रार्थना करूँगा कि राजी-ख़ुशी विवाह करिए। विदाई करा कर बहू को साथ लेकर चलिए नहीं तो यह लोग बेमौत मारे जाएँगे और आप भी इस पाप के भागीदार होंगे।

केदार चाचा ने आद्या प्रसाद जी को डाँटते हुए चुप कराया कहा कि मैनेजर साहब ठीक कह रहे हैं। यह जैसा कह रहे हैं ऐसा करो।

आद्या प्रसाद जी शांत हुए। केदार चाचा ने मुझसे कहा, "भैया जैसा करना हो वैसा करो। हम लोग बारात ले कर के आए हैं तो विवाह करके चलेंगे। समाज में अपनी मानमर्यादा है, उसे खराब नहीं करना है।"

इसके बाद मैंने लाउडस्पीकर वाले को बुलाया और कहा कि अपना कैसेट प्लेयर, भोंपू, बैटरी वगैरह ले करके बारात वाले घर में लगावे। तिवारी जी के घर का दरवाज़ा उत्तर तरफ़ था; गाँव भी उत्तर तरफ़ था। मैंने लाउडस्पीकर वाले से कहा, "भैया लाउडस्पीकर उनकी खपरैल पर रखो, गाँव की तरफ़ उसका भोंपू कर के। फ़ुल वॉल्यूम पर बजाओ जिससे गाँव के हर एक घर, हर प्राणी तक आवाज़ पहुँचे।"

वह अपना ताम झाम लेकर तिवारी जी के घर की ओर चला। बैंड बालों से मैंने कहा बजाना शुरू करो। पेट्रोमैक्स दो थे। वे जिसके नियंत्रण में थे, उससे मैंने कहा कि एक पेट्रोमैक्स तो यहाँ बारात में जलाना और दूसरा तिवारी जी के दरवाज़े पर। और अभी जाकर वहाँ उसके लगाने का इंतज़ाम कर लो नहीं तो अँधेरा हो जाएगा। यह सब करने के बाद दूल्हे के साथियों को मैंने बुलाया। सवारी-गाड़ियों पर चलने वाले फ़ुर्तीले लड़के थे। मैंने उसे कहा कि स्थिति तुम लोग जान-समझ ही रहे हो। यहाँ जो कुछ भी करना है वह हमीं लोगों को करना है। पानी भरना, पानी पिलाना, भोजन बनाना-करना, यह हमारे लोगों को ही करना है। मतलब, बारातियों को ही बारातियों का इंतज़ाम, स्वागत-सत्कार करना और उसे स्वीकार भी करना है। विवाह करना-कराना दूल्हे और दूल्हे के पिता जी, नाई और पंडित और दुल्हन के घर वालों का काम है।

लड़के बहुत ही उत्साहित हुए और बोले कि साहब जो भी आप कहेंगे वैसे हम लोग करेंगे। फिर मैंने पंडित जी से कहा कि आप ही दोनों पक्षों के पंडित है रीति-रिवाज़ पूर्वक मुहूर्त का ध्यान रखते हुए आप अपने विवेक से सारी कार्रवाई कराइए। नापित महोदय से भी मैंने कहा आप दोनों पक्ष से सारे काम कराइए। इसके बाद 5-6 लड़कों को लेकर मैं बारात वाले घर में गया। तिवारी जी को बताया कि सब व्यवस्था हो गई है आप एकदम बेफ़िक्र रहिए। सारी सामग्री इन लड़कों के सुपुर्द कर दीजिए और आप विवाह की रस्म पूरी करने में लग जाइए।

उधर पेट्रोमैक्स वाले ने उपयुक्त बाँस गाड़ कर उस पर पेट्रोमैक्स टाँग दिया था। लाउडस्पीकर भीषण ध्वनि प्रसारित कर रहा था जो गाँव वालों तक अवश्य पहुँचती रही होगी। मेरे साथ आए लड़कों ने भोजन संबंधी सामग्री को अपने कब्ज़े में ले लिया और काम का बंटवारा कर लिया जैसे एक ने भठ्ठी खोदने का काम ले लिया, दो लोगों ने आलू उबालने, कोहड़ा परवल छीलने काटने का काम ले लिया। दो लोगों ने आटा तैयार करने का काम पकड़ लिया। मतलब की बारातियों के भोजन की व्यवस्था ने गति पकड़ ली। इतने में मुझे ध्यान आया की सबेरे जलेबी और आलू बंडा भी बनना है। संयोग से बारात में अशोक हलवाई भी गया हुआ था। एक लड़के को भेज कर मैंने अशोक को बुलवाया। अशोक के आने पर मैंने उनसे कहा कि भैया सवेरे आलू बंडा और जलेबी बनानी है। अशोक ने कहा कि साहेब आलू बंडा बनने में तो कोई भी दिक्क़त नहीं है। पर जलेबी के लिए टाइम कम है। अशोक ने बताया जलेबी का मैटेरियल भीगने के लिए समय ज़्यादा चाहिए। मैंने कहा, "भाई लड़की के पिता की इच्छा है कि बारात वालों को सवेरे आलू बंडा और जलेबी का नाश्ता कराएँ। उन्होंने सामग्री का इंतज़ाम भी किया हुआ है। इसलिए यह दोनों आइटम तो बनाओ भाई। कोई बर्तन लेकर जलेबी का मैदा भिगो दो।"

अशोक अपनी हलवाईगीरी दिखाने लगा कि ठीक से भीग नहीं पाएगा तो जलेबी जो है वह नरम नहीं बनेगी।

मैंने कहा, "उसकी चिंता मत करो तुम, आकार तो जलेबी का रहेगा न। लोग सब देख-जान रहे हैं, कोई किसी प्रकार की टीका टिप्पणी नहीं करेगा। बल्कि बहुत स्वादिष्ट व्यंजन समझकर लोग खाएँगे।"

सो अशोक ने मैदानी भिगो दी और आलू बंडा के लिए अपने हिसाब से आलू छँटवाने लगा। तिवारी जी के घर की मनहूसियत दूर हो गई और घर का वातावरण शादी-ब्याह वाला हो गया। तिवारी जी ने जो भी मिठाई, नमकीन दालमोठ का इंतज़ाम किया हुआ था, उससे बारातियों ने ही बारातियों का स्वागत सत्कार किया। हल्ला-गुल्ला, हँसी-मज़ाक, मनपसंद गानों पर बैंड बजवा के लड़कों ने ख़ूब डांस भी किया। द्वारपूजा की रस्म ढंग से हुई। 10 बजते-बजते सब ने भोजन भी कर लिया और विधि-विधान पूर्वक विवाह कार्य भी संपन्न हुआ। मुझे भी सारी रात आंगन में विवाह कार्यक्रम में बैठे रहना पड़ा। लड़कों ने मनोरंजक विवाहगीत भी गाये।

सुबह का कार्यक्रम अशोक हलवाई के ज़िम्मे था आलू बंडा के लिए उसने आलू उबाल के मसाले तैयार करवा लिए। फिर मेरे पास आया और धीरे से बोला कि साहब जलेबी छानने के लिए कोई नया कपड़ा चाहिए। मैं जनवासे में आया और लोगों से पूछा कि भाई किसी के पास नया कपड़ा, गमछा वगैरह है, जलेबी छाननी है। एक लड़के ने बताया पंडित जी अपने झोले में नया गमछा रखे हैं। उसको निकाले नहीं, पुराने गमछे से ही काम चला रहे हैं। पंडित जी एक मिश्र जी थे जो प्राइमरी स्कूल में प्रधानाध्यापक थे। आम अध्यापकों की तरह चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए सिद्धांत का पालन करते थे। लोटा लेकर मैदान गए हुए थे। जिस लड़के ने बताया था कि उनके झोले में गमछा रखा हुआ है उससे मैंने उनका झोला मँगवाया। उसने कहा, "नहीं साहब पंडित जी बहुत बिगड़ैल हैं। बहुत बिगड़ेंगे मुझे।" तो मैंने ख़ुद ही पंडित जी का झोला उठाकर देखा उसमें नया गमछा रखा हुआ था। मैंने धीरे से गमछा निकाला और ले जाकर अशोक हलवाई को दिया। अशोक ने जलेबियाँ छानीं। जलेबियाँ आकृति से तो बन गई लेकिन सूखी-सूखी रहीं। किसी ने बताया कि पंडित जी अपना गमछा न मिलने से पहले तो बहुत परेशान हुए फिर बहुत कुपित। जब उन्हें बताया गया कि आपका गमछा मैनेजर साहब ने जलेबी छानने के लिए निकाला है तो उन्होंने भरोसा नहीं किया। कहा कि मैनेजर साहब ऐसी छोटी हरकत नहीं कर सकते। इतने में मैं पहुँच गया तो पंडित जी को बताया कि आपका गमछा मैंने ही निकाला था। जलेबी छानने के लिए नए कपड़े की ज़रूरत थी और यहाँ नया कपड़ा सिर्फ़ आपका गमछा ही था। इसलिए पंडित जी आप ग़ुस्सा ना करें आपको मैं नया गमछा दिलवा दूँगा। पंडित जी ने कहा, "आप कह रहे हैं तो मान लेता हूँ। लेकिन भूलिएगा नहीं मुझे नया गमछा दिलवा दीजिएगा।"

इधर बराती आलू बंडा और जलेबियों का स्वाद ले रहे थे, उधर विवाह की रस्में पूरी हो गई थीं और दुल्हन की विदाई हो गई। दुल्हन की विदाई के बाद दूल्हे को आँगन में बुलाया गया जहाँ महिलाएँ भेंट-उपहार देकर अपने तरीक़े से उसकी विदाई की रस्म करने लगीं। इस समय दुल्हन के पिता अर्थात् तिवारी जी से मैंने कहा कि अब आप बारात की विदाई करिए। नाश्ता करने के बाद सारे बाराती तिवारी जी के दरवाज़े पर बैठे हुए थे। तिवारी जी घर के भीतर से पीतल की परात सिर पर रखे हुए बाहर आए। बाहर आकर परात उन्होंने नीचे रखा और अपना गमछा मेरे पैरों पर रखकर मेरे पैर पकड़कर रोने लगे। यह अप्रत्याशित था। मैं हड़बड़ा गया। मैंने झुककर उन्हें उठाते हुए कहा कि आप यह क्या कर रहे हैं। आप मुझसे बड़े हैं, मेरे पैर पकड़ कर क्यों पाप चढ़ा रहे हैं मुझ पर। रुँधे गले से वह बोले- "मैनेजर साहब मुझे अभी भी भरोसा नहीं हो रहा है कि मेरी बेटी का विवाह हो गया।"

जनवासे में पेड़ के नीचे खड़ी एक जीप की ओर इशारा करते हुए मैंने कहा, "देखिए विवाह के बाद आपकी बेटी की विदाई हो गई है और वहाँ पेड़ के नीचे एक जीप पर वह बैठी हुई है। आप सपने से निकलिए और बारात की विदाई करिए। बड़ी गर्मी है दूर जाना है। हम लोग जल्दी निकलेंगे तो तपन शुरू होने के पहले घर पहुँच लेंगे।" वापसी में बराती लोग आपस में नोकझोंक हँसी-मज़ाक करते चले आए। कोई ख़ास उल्लेखनीय घटना नहीं हुई। हाँ लालगंज बाज़ार में गमछा वाले पंडित जी ने गाड़ी रुकवाई और जिस दुकान से पहले वाला गमछा ख़रीदा था, उसी दुकान पर जाकर वैसा ही गमछा लिया; जिसका दाम भुगतान करने में आद्या प्रसाद जी ने बहुत ही हीलाहवाली की। इस प्रकार आद्या प्रसाद जी के बेटे का विवाह कार्य संपन्न हुआ।

उसके बाद मैं वहाँ क़रीब 2 वर्ष तक रहा। तिवारी जी उस बीच तीन-चार बार आए। सबसे पहले मुझसे मिलते थे उसके बाद अपनी बेटी के घर जाते थे। बारातियों ने समाज में अपने अपने तरीक़े से पूरी घटना की चर्चा की, लोगों ने मेरे प्रयास को असाधारण और प्रशंसनीय माना। मेरा आज भी यह सोचना है कि ईश्वर ने मुझे इस घटना का निमित्त बनाया, मैं इसे ईश्वर की कृपा मानता हूँ।


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