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ISSN 2292-9754

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01.01.2016


संजीव कुमार

हिन्दी सिनेमा के भीष्म पितामह कहे जाने वाले अभिनय सम्राट, अभिनेता स्वर्गीय संजीव कुमार अपने आप में एक 'इन्स्टीट्यूट' थे। हर तरह के किरदार करने में महारत हासिल थी, संजीव को। चाहे रोमाँटिक किरदार हो या बूढ़े मरीज़का... आशिक का हो या डाकू का... किसी अपाहिज का किरदार हो या गूँगे बहरे का बड़ी ही संजीदगी से निभाया करते थे।

संजीव कुमार की आत्मकथा में उनके जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें तो हैं ही, इसमें कर्इ अनकही घटनाओं का भी समावेश है, जो आपको कभी हँसायेंगी, गुदगुदायेंगी और कभी चौंकने पर विवश कर देंगी। इस मनेारंजक आत्मकथा के लेखक हैं, मूर्धन्य पत्रकार से फिल्म निर्देशक बने श्री राकेश सिन्हा। जो इत्तेफ़ाक से संजीव कुमार के मित्र भी थे।

संजीव एक रोमाँटिक इंसान थे। उनके अभिनय में करुणा का सागर तो था ही, रोमांस की अविरल धारा भी थी। आज हम उनकी आत्मकथा में रचित उनकी रोमाँटिक अनुभवों की पोटली खोलते हैं। संजीव कुमार की रोमाँटिक कहानी उस समय शुरू हुर्इ जब वे दसवीं में पढ़ते थे। अपनी क्लास की ही एक लड़की से उन्हें प्यार हो गया था। उसका नाम था कुसुम। जल्द ही कुसुम की शादी कहीं और ठीक हो गयी। और यह सिलसिला यहीं ख़तम हो गया। इस घटना से संजीव को ऐसा झटका लगा कि वे दीवाने से हो गए थे। माँ ने देखा तो उन्हें यह सब समझने में देर नहीं लगी। अपने बेटे की भावुकता से वे भली भाँति परिचित थीं। अपनी ममता की छाँव में लेकर उन्होंने संजीव को समझाया बुझाया और धीरे-धीरे सही रास्ते पर ले आर्इं।

माँ^ के कहने पर ही संजीव ने 'इप्टा' ज्वार्इन कर लिया। यही उनके कैरियर की पहली सीढ़ी थी। फिल्मों में आने के बाद संजीव का पहला प्यार सायरा बानो के प्रति हुआ। फिल्म थी "आओ प्यार करें''। संजीव स्वभाव से मज़ाकिया तो थे ही। सेटस् पर हमेशा जोक्स् सुनाया करते रहते थे। जिसे सुनसुन कर नन्हीं सी, अल्हड़ उम्र की सायरा हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाया करती थी। हर दिन उसे संजीव का इन्तज़ार रहने लगा था। सेट पर वो संजीव के ही साथ ज़्यादा समय बिताना पसन्द करती थीं। यही नज़दीकियाँ धीरे-धीरे प्यार में बदलने लगीं। संजीव तो दिल दे बैठे थे, मगर फिल्म की शूटिंग ख़तम होते ही सायरा ने ताल्लुक़ ही ख़तम कर दिया। और इस तरह संजीव सायरा के बीच प्रणय का पनपता पौधा मुरझा गया। संजीव के लिए यह दूसरा धक्का था। बड़ी मुश्किल से वे अपने आप को सम्हाल पाए।

संजीव का प्रेम सम्बन्ध आशा पारिख के साथ भी रहा। आशा उन दिनों स्टार बन चुकीं थीं। दोनों गुजराती में ही बात करते थे। हमभाषी थे, मगर हमराह नहीं बन पाए। आशा का झुकाव उन दिनों के मशहूर निर्माता निर्देशक नासिर हुसेन के प्रति हो गया था। तो संजीव ने अपने प्रेम सम्बन्धों की पोटली वहीं पर वापस बाँध ली और आशा को भुला देना ही बेहतर समझे।

कुछ दिनों के बाद ही फिल्म ''गौरी'' शुरू हुर्इ। इसमें संजीव के साथ हीरोर्इन थी नूतन। मितभाषी नूतन की मीठी-मीठी बातों ने संजीव का मन मोह लिया। नूतन को भी संजीव का साथ भाने लगा था। जब अगली फिल्म ''देवी'' का प्रोपोज़ल आया तो नूतन ने अपने हीरो के रूप संजीव का नाम ही सुझाया। शूटिंग चलती रही और उधर संजीव और नूतन की नज़दीकियाँ बढ़ती गयीं। यह ख़बर उड़ते-उड़ते नूतन के पति रजनीश बहल तक जा पहुँची। उनका खून खौल उठा। वे अगली फ़्लार्इट पकड़ कर सीधे मुबंर्इ आ पहुँचे। फौजी रजनीश ने पहले सारी बातें जानी, फिर उन्होने नूतन के सामने एक शर्त रखी। शर्त यह थी कि या तो नूतन फिल्म लार्इन ही छोड़ दे। या संजीव के गाल पर एक थप्पड़ जड़ दें, वो भी सबके सामने सेट पर। ये निर्णय उन्हें आज और अभी ही लेना होगा।

नूतन को काटो तो खून नहीं। वो एक प्रोफेशनल अभिनेत्री थी। वो जानती थीं, कि अनुबंध तोड़ने का मतलब है, कि उन्हें निर्माता को एक भारी रकम चुकानी पड़ेगी। उन्होंने पति को बहुत समझना चाहा मगर फौजी पति ने एक बार कह दिया तो बस वो पत्थर की लकीर हो गयी।

नूतन के लिए 'कांट्रेक्ट' तोड़ने से, संजीव को थप्पड़ मारना ज़्यादा आसान लगा। वो अपने फौजी पति का गुस्सा भी जानती थीं। उन्होंने ऐसा ही किया। सेट पर पहुँचते ही नूतन ने संजीव के गाल पर एक तमाचा जड़ दिया। पति वहीं खड़े थे। देखकर ठंढी साँस भरते हुए बाहर निकल गए। इस घटना के बाद नूतन अपने मेकअप रूम में आ गयीं और खूब फूट-फूट कर रोने लगीं। संजीव को जब पूरी सच्चार्इ का पता चला तो उनकी नज़र में नूतन की इज़्ज़त और बढ़ गयी। इसके बाद की जितनी भी शूटिंग हुर्इ नूतन और संजीव में बातचीत बन्द रही। संजीव की प्यार की इस कहानी में एक बार फिर पूर्णविराम लग गया।

उसके तीन साल बाद ही एक फिल्म शुरू हुर्इ थी। नाम था 'धूप छाँव'। इसकी हीरोइन थी हेमा मालिनी। यह वो समय था जब धर्मेन्द्र हेमा मालिनी के दीवाने हो चुके थे। मगर हेमा की माँ जया चक्रवर्ती जो तमिल ब्राह्मण थी, उन्हें धर्मेन्द्र पसन्द नहीं थे। क्योंकि धर्मेन्द्र वेज नहीं थे 'नॉन वेज' थे। जब जया जी ने हेमा और संजीव की नज़दकियों की बात सुनी तो उन्हें इसमें कोर्इ एतराज़ नहीं था। क्योंकि संजीव 'वेज' थे। इन्हीं दिनों एक फिल्म शुरू हुर्इ थी जिसका नाम था 'शोले'। इसमें धर्मेन्द्र और हेमा की जोड़ी थी। फिल्म ''शोले'' की शूटिंग के दौरान हेमा और संजीव ने शादी का निर्णय भी ले लिया था। मगर धर्मेन्द्र का हेमा के प्रति जो बेहद प्यार था, उसका पता चला तो संजीव ने बीच से हट जाने का निर्णय ले लिया। एक बार फिर संजीव के प्रेम प्रसंग पर पूर्ण विराम लग गया। संजीव ने बातों बातों में बताया कि उनके दिल में बसी हेमा के प्रेम की प्रणयाग्नि को शीतल होने में बरसों लग जाएगें। शनै: शनै: समय के झोंको ने इस लपट को न्यूनतम तो कर दिया। पर यह एक खलिश बन कर संजीव के जीवन में हमेशा विद्यमान रहा।

एक बार जब मैने इसी विषय पर संजीव से पूछा कि अब हेमा के साथ उनका कैसा रिश्ता है तो बीच ही में बात काट कर संजीव ने कहा कि "छोड़ो राकेश... आओ कुछ और बातें करते हैं यार"। मुझे समझते देर नही लगी कि अब संजीव को चोट गहरी लगी है। और वे यह अपना दर्द किसी के साथ भी 'शेअर' नहीं करना चाहते हैं। बस अपने तक ही रखना चाहते हैं। शायद यही वज़ह होगी कि उन्हें उनका ही दर्द कचोटता रह गया। और इतनी कम उम्र में वो भगवान को प्यारे हो गए।

वो दुर्भाग्य पूर्ण दिन था 6 नवम्बर 1985। जब वो अपने करोड़ों चाहने वालों को बिलखता हुआ छोड़कर हमसे हमेशा हमेशा के लिए विदा हो गए। अभिनय के रंगमंच पर सबको बिलखता हुआ छोड़ कर, वे कूच कर गए। और आज हम सब बस उनकी यादें और उनकी फिल्में देख-देख कर उनको याद करते रहते हैं... याद करते रहेगें। संजीव कुमार की 130 फिल्में पूरे सिनेमा के इतिहास में अमरत्व प्रदान करता रहेगा। इस सिनेजगत को युग-युग तक जीवित रखेगा.....

(संजीव कुमार की पूरी आत्म कथा उपलब्ध है। निम्नलिखित ई-मेल पर सम्पर्क करें)
rakeshsinha18@gmail.com


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