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ISSN 2292-9754

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07.15.2016


देश मेरी आँखें नम हैं

चिड़ियों का कलरव बंद हुआ, भँवरों का गुंजन मंद हुआ
ऐ देश मेरी आँखें नम हैं क्यों तेरा वन्दन बंद हुआ।

चौपालों पर सूनापन है कहने भर को अपनापन है।
सच कहने का साहस किसमें झूठों का ही आराधन है।
मानवता सिसक रही है और समरसता पर प्रतिबंध हुआ।
ऐ देश मेरी आँखें नम हैंक्यों तेरा वन्दन बंद हुआ॥

धरती से अम्बर तक देखो नदियों से सागर तक देखो
चहुँ ओर कुहासा छाया है पनघट से गागर तक देखो।
भँवरों संग नाव डुबाने का पतवारों में अनुबंध हुआ।
ऐ देश मेरी आँखें नम हैं क्यों तेरा वन्दन बंद हुआ॥

शृंगारिकता अश्लील हुई लज्जा बुझती कंदील हुई
कैसा इतिहास बनेगा अब जब संस्कृति ही तब्दील हुई।
मर्यादा होती तार-तार सब कुछ इतना स्वछन्द हुआ।
ऐ देश मेरी आँखें नम हैं क्यों तेरा वन्दन बंद हुआ

जुड़ गए हैं पूरी दुनिया से पर अपने घर से टूट गए।
गैरों से समझौते करते पर हम अपनों से रूठ गए।
घर बदल गए हैं, कमरों में ये कैसा उचित प्रबंध हुआ
ऐ देश मेरी आँखें नम हैं क्यों तेरा वन्दन बंद हुआ॥

मस्जिद सूनी मंदिर सूने गिरिजाघर गुरुद्वारे सूने
हर जगह लगी है भीड़ मगर बिन भक्तों के भगवन सूने।
बाहर मन सब मिल जाते हैं अंतर्मन मिलना बंद हुआ।
ऐ देश मेरी आँखें नम हैं क्यों तेरा वन्दन बंद हुआ॥


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