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05.31.2008
 

विश्वास के अंकुर
राकेश मिश्रा


आज मन के एक नीरव कोने में
कुछ बीज अंकुरित्त हुए हैं।
इनमें से कुछ आशा के हैं, तो
थोड़े एक विश्वास के भी
बाकी सब तो रूमानी सपनों के हैं।

सपनों के कोमल बीज तो शायद ही
उग कर पौधे बनेंगे
आखिर, कठोर धरती को भेद कर
पुष्पित होने का साहस
भला इन रक्षित कोमलांगियों में कहाँ!

आशा के बीज अंकुरित होकर
धरा पटल पर प्रस्फुटित तो हो उठेंगे
लेकिन उसके बाद?
गर्म हवा और एकाकी अस्तित्व की नियति
इन सहमे हुए बाल-रूप पौधों को
रक्ताभ, हरितपर्णी रूप पाने के पूर्व ही
निस्पन्दित कर देगी।
कटु, परन्तु कितना सत्य साक्षात्कार है यथार्थ से!

तो क्या अब से
नये पुष्प और पल्लव विकसित ही नहीं होंगे?
प्रकृति का रूप अब कभी सँवरेगा ही नहीं?

अरे नहीं
भला प्रकृति के उठान की भी थाह है!
और, फिर अभी तो
उपेक्षित, किन्तु महत्वपूर्ण
विश्वास के बीज तो अछूते ही पड़े हैं।

ये ठीक है कि कभी किसी ने
इन्हें गीली मिट्टी की सहज सुरक्षा में नहीं रखा, और
गरम हवा के झोंकों से भी किसी ने बचाया क्या?

पर, इससे क्या!
रक्षित न होने की वेदना से ही तो
ये विश्वास बीज अन्यतम जीवनरस पाते हैं
धैर्य रखो, बस कुछ समय तक
फिर, धीरे-धीरे कठोर धरा भी
इन परित्यक्त अंकुरों को अपना ही लेगी।

आखिर, कब तक रूठी रहेगी
ये माँ जैसी प्रकृति वाली धरा?
और, इनके बालहठ पर जैसे ही वात्सल्य मुग्ध हुआ
फिर से जीवन के बोल चहक उठेंगे
इन नवांकुरित विश्वास के बीजों के आसपास।

रूप मोहक नहीं है
गन्ध मादक नहीं है
रस उपयोगी नहीं है
फिर, ये विश्वास के पुष्प किस काम के?

क्या केवल रति ही अन्तिम कसौटी है,
जीवन सौन्दर्य के मापदण्ड हेतु?
गन्ध और रस क्या इतने महत्वपूर्ण हैं?
प्राभ भरे, साँस लेते, बचपन से भी ज्यादा?

नहीं।
ये नन्हे साधक अपनी तापस प्रवृत्ति से
कुछ न कुछ तो सार्थक करेंगे ही।
इनकी क्यारी में मानस बालपन को
खुलकर साँस लेने देते हैं
पीड़ित और सशंकित मानवत को
ये फूल ही सिखायेंगे
मानवीय गरिमा के साथ जीने का
अद्‌भुत, अदम्य और आवश्यक पाठ।

एक दूसरे की आँखों में
आँखें डालकर देखने का साहस, और
एक दूसरे के प्रति सहज विश्वास का
सुगम एवं सरल पाठ भी
यही विश्वास के पुष्प पढ़ायेंगे
सजीव, मूर्त रूप में।

इसी सन्दर्भ में, एक बात और
जब हमें ज़रूरत इन विश्वास के पौधों की है
हमारा साध्य भी इन्हीं से जुड़ा है
फिर, सपनों के रूमानी बाग में
आशा के भड़कीले, परन्तु प्राणहीन
बीजों के अंकुरित न हो पाने का
अफ़सोस कैसा? और क्यों?

अरक्षित, असाधारण और अनन्य
विश्वस के अंकुर ही तो
अपने गर्भ में समेटे हैं
भूत का दीर्घ इतिहास
वर्तमान की अदम्य जिजीविषा, और
भविष्य का सम्पूर्ण अस्तित्व।

मानवता, सहेज कर रखो इन्हें तुम
क्योंकि सहज, सामान्य पर दुर्लभ से हैं ये
विश्वास के अंकुर।


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