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05.31.2008
 

कम्पित दीपशिखा
राकेश मिश्रा


साधारण सूत से ही जन्म और रूप पाकर भी, आत्ममुग्धा
इस बाती का गर्वित यौवन तो देखो जरा!

कभी उत्तेजित स्पन्दन से अनुप्राणित,
कभी सन्देहासिक्त कम्पन से भयभीत
उफ़! रूप, रंग, राग तो देखो
इस जीवन भरी, इठलाती लौ के रूप में
आत्माहुति देती इस बाती का।

तमस भी भ्रमित है इससे
क्यों? ऐसा भी क्या?

अब निशाचर तमस भी क्या करे!
जहाँ जीवन ही स्वयमेव मूर्त हो उठा हो
प्राणपुँज आनन्दमग्न हो नाच रहे हों
और, सृष्टि स्वयं ही आकार ले उठी हो
इस कम्पित दीपशिखा का
तो, तमस के तामसिक बंधुओं को पूछे ही कौन!

तुम अस्तित्वमान होकर भी
अप्रभावी हो, तमस!
अब कहीं दूर देश जाकर ढूँढो
एक अन्धेरे संसार का पापित कोना
और वो भी तब तक के लिये ही,
जब तक वहाँ भी कोई जीवनसाधिका
अपना अखण्ड व्रत शुरू नहीं करती
क्योंकि, फिर वहाँ भी जी उठेंगे
सत्य, शिव और सुन्दरता के दीप्त राग
और, उनको जन्म देगी, फिर एक
अग्निगर्भा, कम्पित दीपशिखा!


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