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05.03.2012
 
ज़िन्दगी बस बिलम्बित बजाती रही
राकेश खण्डेलवाल

तुम को आवाज़ देता रहा हर निमिष
पर महज गूँज ही लौट आती रही

दर्द सीने में अपने छुपाये रखा
था बताने से कुछ भी नहीं फ़ायदा
प्यार की रीत क्या? मैंने जानी नहीं
न ही समझा यहाँ का है क्या कायदा
भावनाओं में उलझा रहा अब तलक
लोग मुझको खिलौना समझते रहे
चाह कर भी शिकायत नहीं कर सका
शब्द मेरे गले में अटकते रहे

और तन्हाई दीपक जला कर कई
द्वार दिल के दिवाली मनाती रही

थे उठे ठोकरों से, गुबारों को मैं
सींच कर आँसुओं से दबाता रहा
पथ तुम्हारा सुखद हो सके इसलिये
राह में अपनी पलकें बिछता रहा
पर गये तुम तो फिर लौट आये नहीं
साथ पलकों के नज़रें बिछी रह गई
आँसुओं की उमड़ती हु बाढ़ में
मेरे सपनों की परछायाँ बह गई

और अम्बर से लौटी हुई प्रतिध्वनि
शंख, ढोलक, मजीरे बजाती रही

पाँव फिसले मेरे सर्वदा उस घड़ी
इन्च भर दूर जब था कंगूरा रहा
दूसरा अन्तरा लिख ना पाया कभी
गीत हर एक मेरा अधूरा रहा
एक पल देर से राह निकली सभी
एक पग दूर हर एक मन्ज़िल रही
एक टुकड़ा मिली चाँदनी कम मुझे
एक जो साध थी, अजनबी हो रही

और सूनी नज़र को क्षितिज पर टिका
ज़िन्दगी बस बिलम्बित बजाती रही

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