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| 01.30.2008 |
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यादों का मौसम राकेश खण्डेलवाल |
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यों तो मौसम अनगिन आते रहे और बीते
एक तुम्हारी यादों का केवल दिन रात रहा जब जब चली भोर संध्या में झोंकों भरी हवा तब तब आई उमड़ तुम्हारी यादों की बदली -रहा भेजता आमंत्रण पल पल उसको सावन लेकिन मेरा द्वार छोड़ कर गई नहीं पगली बुनती रही तितलियों के पंखों पर स्वप्न नये मीत तुम्हारे तन की गंधें, रंगों में भर कर सेमल के उड़ते फाहों पर अंकित नाम किया एक तुम्हारा, उगी चाँदनी की आभा लेकर एक निमिष भी उसकी चादर, जरा नहीं सिमटी सूरज की किरणों ने आकर कितनी बार कहा करे कार्तिक दीपों की अगवानी की बातें या फागुन खेतों को भेजे सोने के गहने हरे गलीचे करें तीज का स्वागत पथ बिछकर आँगन देहरी, रंगबिरंगी राँगोली पहनें चित्र तुम्हारे बन जाते सहसा दीवारों पर और अजन्ता एलोरा की गलियाँ बन जातीं खिड़की की सिल पर आ बैठी एक कोई कोयल एक तुम्हारे वर से उपजा हुआ राग गाती दिन-दोपहरी, माघ-फूस, जेठों-बैसाखों में एक यही गतिक्रम है जो साँसों के साथ रहा घिरे गगन-गंगा के तट पर तारों की छाया करे चाँदनी चन्दा से या प्यार भरी बातें बेला फूले, महक लुटाये गमक रातरानी धुली रोशनी से चमकी हों उजियारी रातें पल की धड़कन दोहराते बस एक नाम केवल जिसका है प्रारंभ तुम्हीं से, और अंत तुम पर लहरें, भँवरे, बुलबुल, मैना तारों की सरगम सब दुहराते, और पपीहा गाता है वह स्वर मौसम कभी बदल पायेगा जब जब यह सोचा रेतीले टीलों सा यह भ्रम था, हर बार ढहा |
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