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| 05.22.2009 |
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वाणी ने कर दिया समर्पण राकेश खण्डेलवाल |
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व्यक्त नहीं हो सकी हृदय की भाषा जब कोरे शब्दों में
हुआ विजेता मौन और फिर वाणी ने कर दिया समर्पण दृष्टि हो गई एक बार ही नयनों से मिल कर सम्मोहित और चेतना साथ छोड़ कर हुई एक तन्द्रा में बन्दी चित्रलिखित रह गया पूर्ण अस्तित्व एक अनजाने पल में बाँध गई अपने पाशों में उड़ कर एक सुरभि मकरन्दी वशीकरण, मोहन, सम्मोहन, सुधियों पर अधिकार जमाये समझ नहीं पाया भोला मन, जाने है कैसा आकर्षण गिरा अनयन, नयन वाणी बिन, बाबा तुलसी ने बतलाया पढ़ा बहुत था किन्तु आज ही आया पूरा अर्थ समझ में जिह्वा जड़, पथराये नयना, हुए अवाक अधर को लेकर खड़ी देह बन कर प्रतिमा इक, शेष न बाकी कुछ भी बस में संचय की हर निधि अनजाने अपने आप उमड़ कर आई होने लगा स्वत: ही सब कुछ, एक शिल्प के सम्मुख अर्पण आने लगे याद सारे ही थे सन्दर्भ पुरातन, नूतन कथा, गल्प, श्रुतियाँ, कवितायें पढ़ी हुई ग्रन्थों की बातें यमुना का तट, धनुर्भंग वे पावन आश्रम ॠषि मुनियों के नहीं न्याय कर पाये उससे, मिली हृदय को जो सौगातें खींची हैं मस्तक पर कैसी, भाग्य विधाता ने रेखायें उनका अवलोकन करने को देख रहा रह रह कर दर्पण |
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