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05.03.2012
 
वाणी ने कर दिया समर्पण
राकेश खण्डेलवाल

व्यक्त नहीं हो सकी हृदय की भाषा जब कोरे शब्दों में
हुआ विजेता मौन और फिर वाणी ने कर दिया समर्पण

दृष्टि हो गई एक बार ही नयनों से मिल कर सम्मोहित
और चेतना साथ छोड़ कर हुई एक तन्द्रा में बन्दी
चित्रलिखित रह गया पूर्ण अस्तित्व एक अनजाने पल में
बाँध गई अपने पाशों में उड़ कर एक सुरभि मकरन्दी

वशीकरण, मोहन, सम्मोहन, सुधियों पर अधिकार जमाये
समझ नहीं पाया भोला मन, जाने है कैसा आकर्षण

गिरा अनयन, नयन वाणी बिन, बाबा तुलसी ने बतलाया
पढ़ा बहुत था किन्तु आज ही आया पूरा अर्थ समझ में
जिह्वा जड़, पथराये नयना, हुए अवाक अधर को लेकर
खड़ी देह बन कर प्रतिमा इक, शेष न बाकी कुछ भी बस में

संचय की हर निधि अनजाने अपने आप उमड़ कर आई
होने लगा स्वत: ही सब कुछ, एक शिल्प के सम्मुख अर्पण

आने लगे याद सारे ही थे सन्दर्भ पुरातन, नूतन
कथा, गल्प, श्रुतियाँ, कवितायें पढ़ी हुई ग्रन्थों की बातें
यमुना का तट, धनुर्भंग वे पावन आश्रम ॠषि मुनियों के
नहीं न्याय कर पाये उससे, मिली हृदय को जो सौगातें

खींची हैं मस्तक पर कैसी, भाग्य विधाता ने रेखायें
उनका अवलोकन करने को देख रहा रह रह कर दर्पण

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