अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 
वन्दन
राकेश खण्डेलवाल


तेरे आशीषों की छाया, सुरभित मंद समीर बन गई
स्वाति मेघ तुम, एक बूँद इस सीपी की तकदीर बन गई

तुम न देते दिशा तो जीवन भ्रमित हुआ भटका रह जाता
प्राण पपीहा दो दिन पीहू पीहू रटता थक सो जाता
लेकिन ओ आराध्य तुम्हारे एक इशारे से इस पथ की
काँटों भरीं झाड़ियाँ सारी फूलों की जागीर बन गई

नयनों की भटकन को तुमने एक बिन्दु का दिया ठिकाना
हर इक निमिष समर्पित तुमको, मुश्किल है उॠण हो पाना
हर आँसू, हर विपदा, हर दु:ख, सब कुछ तुमने बदल दिया है
अपना सब कुछ मुझे सौंपकर प्रभुता आज फ़कीर बन गई

मेरी हर धड़कन को तुमने पूजा का अनुराग दिया है
काट छाँट माया के भ्रम को जीने का विश्वास दिया है
ओ प्राणेश ! मेरे जीवन का हर पल देन तुम्हारी ही है
तेरी करुणा इन हाथों में किस्मत लिखी लकीर बन गई

आशाओं के इन्द्रधनुष को तुमने ही विस्तार दिया है
अनगढ़ मिट्टी था ये जीवन, तुमने ही आकार दिया है
ओ मेरे स्वरकार! तुम्हारे अनुग्रह की अनुकंपा पाकर
एक प्रीत की नाजुक डोरी, पांचाली का चीर बन गई।

अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें