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05.03.2012
 
उत्तर सारे मौन रह गये
राकेश खण्डेलवाल

उत्तर सारे मौन रह गये हैं प्रश्नों के इन्तज़ार में
तुमने पूछा नहीं अभी तक कितना प्यार तुम्हें करता हूँ

शब्द प्यार की गहराई को बतला पायें क्या है संभव
मन के बन्धन होठों पर आ जायें ये होता है कब
सौ सौ साखी लिख कर भी जो व्यक्त कबीरा कर न पाया
मीरा के इकतारे ने ये भेद और ज्यादा उलझाया

मेरी कोशिश उन भावों को अपने मीत, तुम्हें समझाऊँ
इसीलिये तो लिये प्रतीक्षा प्रश्नों की तुमको तकता हूँ

मज़दूरी से जितना करतीं किसी श्रमिक की सुदृढ़ बाहें
कुंकुम से करतीं दुल्हन की स्वप्न सजाती हुई निगाहें
प्यासी धरती जितना करती सावन के पहले बादल से
पोर उँगलियों के करते हैं असमंजस में जो आंचल से

आशान्वित हूँ तुम पढ़ लोगे नयनों में जो लिखी इबारत
जिसके अक्षर अक्षर में मैं तुमको ही चित्रित करता हूँ

जितना प्यार गज़ल से करता, विरह-पीर से हो स्वर घायल
जितना थाप करे तबले से, करे नॄत्य से जितना पायल
सागर करता, शंख सीपियाँ अपने हृदय सजा कर जितना
मंदिर करे आरती से ज्यों, करे नैन से जितना काजल

बन्धन तोड़ सभी संकोची, तुम्हें आज मैं बता सकूँगा
नित्य भोर की प्रथम किरण के संग संकल्प किया करता हूँ

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