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| 07.06.2008 |
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उत्तर गुमनाम रहे राकेश खण्डेलवाल |
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एक प्रश्न जो ढलती निशा उछाल गई
उत्तर उसका ढूँढ सुबह से शाम रहे थकन पंथ के अंतिम कदमों की, या हो उगी भोर की अँगड़ाई में क्या अंतर संकल्पों की भरी आँजुरी में संशय या हो आहुतियों से रही आँजुरि भर एक अकेला तारा नभ में उगा प्रथम याकि आखिरी तारा, गगन अकेला हो दृष्टि साधना, प्रथम मिलन की आस लिये दृष्टि मिले जब घिरे विदा की बेला हो हैं समान पल, लेकिन अर्थ विलग क्यों हैं प्रश्न चिन्ह यह आकर उँगली थाम रहे प्रश्नों के व्यूहों में उत्तर घिरे हुए जाने कैसे स्वयं प्रश्न बन जाते हैं उतनी और उलझती जाती है गुत्थी जितना ज्यादा हम इसको सुलझाते हैं सर्पीली हों पगडंडी, या हों कुन्तल भूलभुलैय्या राह कहाँ बन पाती है हो आषाढ़ी या हो चाहे सावन की एक अकेली बदली क्या क्या गाती है अपनी आँखों के दर्पण में छाया को हम तलाशते हर पल आठों याम रहे कोई अटका रहा वॄत्त में, व्यासों में कोई उलझा बिन्दु परिधि के पर जाकर कोई अर्धव्यास में सिमटा रहा सदा कोई था समकोण बनाये रेखा पर हम थे त्रिभुजी, किन्तु आयतों में उलझे कोई जिनमें नहीं रहा सम-अंतर पर सारे जोड़ गुणा बाकी के नियम थके जीवन का इक समीकरण न सुलझा पर अंकगणित से ज्यामितियों के बीच रहा बीजगणित, जिसके उत्तर गुमनाम रहे |
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