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| 03.16.2009 |
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तुमने मुझसे कहा, लिखूँ मैं गीत तुम्हारी यादों वाले
राकेश खण्डेलवाल |
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तुमने मुझसे कहा, लिखूँ मैं गीत तुम्हारी यादों वाले
लेकिन मन कहता है मुझको याद तुम्हारी तनिक न आये याद करूँ मैं क्योंकर बोलो तीन पौंड का भारी बेलन जो रोज़ाना करता रहता था, मेरे सर से सम्मेलन तवा कढ़ाही, चिमटा झाड़ू से शोभित वे हाथ तुम्हारे रहें दूर ही मुझसे,नित मैं करता आया नम्र निवेदन छुटकारा पाया है जिसने टपक रहे छप्पर से कल ही उससे तुम आशा करती हो, सावन को फिर पास बुलाये याद करूँ मैं, चाल तुम्हारी, जैसे डीजल का ड्रम लुढ़के या मुझसे वह बातें करना, जैसे कोई बन्दर घुड़के रात अमावस वाली कर लूँ, मैं दोपहरी में आमंत्रित न बाबा न नहीं देखना उन राहों पर पीछे मुड़के छालों से पीड़ित जिह्वा को आज जरा मधुपर्क मिला है और तुम्हारा ये कहना है फिर से तीखी मिर्च चबाये याद करूँ मैं शोर एक सौ दस डैसिबिल वाले स्वर का जिससे गूँजा करता कोना कोना मेरे मन अम्बर का नित जो दलती रहीं मूँग तुम बिन नागा मेरे सीने पर और भॄकुटि वह तनी हुई जो कारण थी मेरे हर डर का साथ तुम्हारे जो भी बीता एक एक दिन युग जैसा था ईश्वर मुझको ऐसा कोई दोबारा न दिन दिखलाये तुमने कहा लिखो, पर मैं क्यों भरे हुए ज़ख्मों को छेड़ूँ बैठे ठाले रेशम वाला कुर्ता मैं किसलिये उधेड़ूँ जैसे तैसे छुटकारा पाया प्रताड़ना से, तुम देतीं और तुम्हारी ये चाहत है, मैं खुद अपने कान उमेड़ूँ हे करुणानिधान परमेश्वर, मेरी यह विनती स्वीकारो भूले भटके सपना भी अब मुझे तुम्हारा कभी न आये |
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