| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 03.14.2008 |
|
शब्द से दूरी राकेश खण्डेलवाल |
|
रंग सिमटे रहे तूलिका में सभी, कैनवस एक कोरा रहा सामने
जुड़ सका कोई परिचय की डोरी नहीं, नाम जो भी दिया याद के गाँव ने भावनाओं की भागीरथी में लहर, अब उठाते हैं झोंके हवा के नहीं लड़खड़ाते हुए भाव गिरते रहे, शब्द आगे बढ़े न उन्हें थामने इसलिये गीत शिल्पों में ढल न सका, छैनियाँ हाथ में टूट कर रह गईं और सीने की गहराई में भावना, अपनी परछाईं से रूठ कर रह गई गुनगुनाती हुए कल्पना थक गई, साज कोई नहीं साथ देने बढ़ा और पलते हुए भ्रम की गगरी सभी, एक पल में गिरीं, टूट कर बह गईं ---------------------------------------------------------------------------- रात की छत पे आकर ठहरता तो है, चाँदनी से मगर बात करता नहीं जाने क्या हो गया चाँद को इन दिनों, पांखुरी की गली में उतरता नहीं ये जो मौसम है, शायद शिथिल कर रहा, भावना, भाव, अनुभूतियाँ, कल्पना शब्द आकर मचलते नहीं होंठ पर, गीत कोई सुरों में सँवरता नहीं ------------------------------------------------------------------------------ कल्पना के अधूरे पड़े पॄष्ठ पर, नाम किसका लिखूँ सोचता रह गया एक बादल अषाड़गी उमड़ता हुआ, और एकाकियत घोलता बह गया घाटियों में नदी के किसी मोड़ पर, राह भटकी हुई एक मुट्ठी हवा साथ दे न सकी एक पल के लिये, पंख, पाखी हृदय तोलता रह गया |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|