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| 06.13.2007 |
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सहमे झरने खड़े राकेश खण्डेलवाल |
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सहमे झरने खड़े, सो गईं झील भी
देह के साज पर सर्दियाँ गा रहीं ओढ़ मोटी रजाई को लेटे रहीधूप, लाये कोई चाय की प्यालियाँ हाथ की उँगलियों को मिले उष्णता इसलिये थी बजाती रही तालियाँ भोर कोहरे का कंबल लपेटे हुए आँख मलती हुई आई अलसाई सी ठिठुरनों में सिमटती हुई रह गई झाँक पाई न पूरब से अरुणाई भी और हिमवान के घर से आई हवा ऐसा लगता नहीं अब कहीं जा रही पूर्णिमा वादियों में पिघल बह रही रात पहने हुए शुभ्र हिम का वसन कुमकुमों से टपकती हुई रोशनी को लपेटे हुए धुंध का आवरण राह निस्तब्ध, एकाकियत को पकड़ आस पदचिन्ह की इक लगाये हुए पेड़ चुप हैं खड़े, शत दिवस हो गये पत्तियों को यहाँ सरसराये हुए शीत की ले समाधी नदी सो गई तट पे, अलसी शिथिलता लगा छा रही तार बिजली के दिखते हैं मोती जड़े स्तंभ पर चिपके फहे रुई के मिलें देहरी चौखटें सब तुषारी हुईं कोशिशें कर थके द्वार पर न खुलें लान, फुटपाथ,सड़कें सभी एक हैं क्या कहाँ पर शुरू, क्या कहाँ पर खतम एक मन, इक बदन, एक जाँ हो गये सब पहन कर खड़े श्वेत हिम का वसन और हम थरथरा देखते रह गये कहता टीवी कि लो गर्मियाँ आ रही |
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