अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 
सावन
राकेश खण्डेलवाल

चाहतें दिल में अपने हजारों पलीं, कोरी चाह्त से पर कुछ भी होता नहीं
स्वप्न आतुर हैं सैधें लगाये मगर, नैन के गाँच में कोई सोता नहीं
चैत बैसाख, फागुन सभी द्वार पर आके खुद ही बसेरा बनाते रहे
सैंकड़ों मैंने भेजे निमन्त्रण मगर, एक सावन ही आके भिगोता नही


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें