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| 05.22.2009 |
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पूजा की थाली राकेश खण्डेलवाल |
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पूजा की थाली तो सजती रहती है नित साँझ सकारे
लेकिन श्रद्धा बिना तुम्हारे आशीषों के नहीं जागती रोली अक्षत फूल धूप का कितना भी अम्बार लगाऊँ पंचम सुर में नाम तुम्हारा जितना भी चाहे चिल्लाऊँ एक हाथ में दीप उठाकर दूजे से घन्टी झँकारूँ मस्तक पर चन्दन के टीके विविध रूप में नित्य सजाऊँ किन्तु तुम्हारी कॄपा न हो तो ये सब आडम्बर ही तो है बिना तुम्हारे इच्छा के विधि अपना लेखा नहीं बाँचती जो भ्रम है मुझको, मेरा है! मुझे विदित वह कब मेरा है एक तुम्हारी माया के सम्मोहन ने ही तो घेरा है जो है वो है नहीं और जो नहीं वही तो सचमुच ही है यह मंज़िल है कहाँ? महज दो पल को ही तो ये डेरा है तेरी चाहत अगर न हो तो कोई योगी भी क्या समझे तेरे इंगित बिना ज्ञान के सूरज की न किरण जागती ओ प्राणेश दिशा का अपनी निर्देशन दे मुझको पथ में दे मुझको भी जगह सूत भर, तू जिसका सारथि उस रथ में मेरे मन के अँधियारे में बोध दीप को कर दे ज्योतित कर ले मुझको भी शामिल तू अपने मन के वंशीवट में तेरे कॄपासिन्धु की लहरें छू लेंगी कब इस मन का तट लिये प्रार्थना मेरी नजरें रह रह कर बस पंथ ताकतीं |
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