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| 06.13.2007 |
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फागुन राकेश खण्डेलवाल |
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ओढ़ बसन्ती चूनर पुरबा, द्वारे पर काढ़े राँगोली चौपालों पर के अलाव अब उत्सुक होकर पंथ निहारें पल्लव पल्लव ले अँगड़ाई, कली कली ने आँखें खोली बरगद पर, पीपल पर बैठी बुलबुल, कोयल, मैना बोली |
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