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| 02.24.2008 |
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पतझड़ का अध्याय खुला
राकेश खण्डेलवाल |
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देते हैं हम नित्य ज्योति को आवाज़ें
लेकिन नहीं दीप में आ बाती जलती हमने जब जब भी बहार की पुस्तक के पन्ने खोले, पतझड़ का अध्याय खुला मिला जिसे आशीष नहाओ दूधों से हर वह सपना मिला आक के दूध धुला आशायें पल्लवित हुईं लेकिन ऐसे जैसे सरसों जमती खुली हथेली पर दोपहरी की धूप ढूँढ़ ले या जैसे बिन्दु ओस के आधी खिली चमेली पर ठोकर खाकर गिरे और फिर उठे संभल लेकिन फिर से ठोकर भूमिसात करती खड़े हुए व्यवधान बने थे दरवाज़े अंगनाई इसलिये पगों से दूर रही दीवारों पर चिपकी हुईं चार कौड़ी अपने मद में इतराती हो चूर रही टूटे हुए सीप के टुकड़े ऊँगली की रहे पहुँच से परे सूत भर हो आगे देहरी की अल्पना अधूरी रंग बिना खोये रंग नहीं मेंहदी के भी जागे और खिड़कियाँ ताक लगाये थी बैठीं कोई परछाईं ही आये पग धरती हमने जो आकाश समेटा मुट्ठी में वह सूरज चंदा तारों से विलग रहा उल्कायें आ बैठीं बिन आमंत्रण के धूमकेतु जो आया वापिस नहीं गया नदिया नहीं पर्वतों से बाहर निकली सूख गई बोई आशाओं की क्यारी और धरोहर एक आस्था की जो थी टूट टूट कर तिल तिल बिखरी बेचारी पीकर सब संकल्प निराशा एक घनी बैठी हुई उबासी ले पंखा झलती बिखरी है हर बार ज़िन्दगी पन्नों सी कोई वापिस आकर क्रम से नहीं बँधा बिगड़ा रहा संतुलन लम्हे लम्हे का किसी घड़ी के काँटे के संग नहीं चला फूल लिये हाथों में, अक्षत बिखर गये और अर्चना के श्लोक अधूरे थे रहे नाचते सदा इशारों पर जिनके कोई मदारी न था, सभी जम्हूरे थे लिये प्रतीक्षा बैठे हुए चाँदनी की देखें आखिर कब ये मावस है ढलती |
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