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05.03.2012
 
ओ पिया ओ पिया
राकेश खण्डेलवाल

 
जाने किसके बदन की उड़ी गंध को
पीके झोंका हवा का मचलता हुआ
मेरे सीने से आकर लिपटते हुए
कह रहा, ओ पिया! ओ पिया ! ओ पिया

ताल के मध्य में एक जलकुंड से
सूर्य के बिम्ब की रश्मियाँ थाम कर
छांह से पत्तियों की फ़िसलते हुए
लिख रहा नाम अपना मेरे नाम पर
उँगलियों से हथेली की रेखाओं में
जाने क्या ढूँढ़, महसूस करता हुआ
इक सुहाना मधुर पल ज्यों अहसास का
अधखुली मुट्ठियों में जकड़ता हुआ

फूल की पांखुरी की किनारी पकड़
पत्र पर बादलों के लगा लिख दिया
ओ पिया, ओ पिया, ओ पिया, ओ पिया

वादियों में शिखर से उतरता हुआ
भोर की घंटियों से उठा जाग के
और पगडंडियों के किनारे खड़ी
दूब को देता संदेश अनुराग के
मलयजी ओढ़नी को लपेटे हुए
ढल रही साँझ जैसा लजाता हुआ
कोयलों के सुरों की पिरो रागिनी
कंठ में अपने, वंशी बजाता हुआ

कसमसाती हुई एक अँगड़ाई सा
बन के पारा मचलता हुआ बह दिया
ओ पिया, ओ पिया, ओ पिया, ओ पिया

स्वप्न की वीथियों में टपकती हुई
चाँदनी में भिगो पाँव धरता हुआ
ओस के पद सी कोमल लिये भावना
मुझको छूते हुए कुछ सिहरता हुआ
गुनगुनाते हुए एक संदेस को
साज की तंत्रियों में पिरोये हुए
वेणियों में सँवरते हुए पुष्प की
गंध को, अंक अपने समेटे हुए

भोर के द्वार पर देके आवाज़ फिर
नाम रांगोलियों में रँगा, रख दिया
ओ पिया, ओ पिया, ओ पिया, ओ पिया

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