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| 06.13.2007 |
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नूर राकेश खण्डेलवाल |
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मेरी अँगनाई में मुस्कुराने लगे, वे सितारे जो अब तक रहे दूर के
दूज के, ईद के, चौदहवीं के सभी चाँद थे अंश बस आपके नूर के ज़िन्दगी रागिनी की कलाई पकड़, एक मल्हार को गुनगुनाने लगी आपकी उँगलियाँ छेड़ने लग पड़ीं तार जब से मेरे दिल के सन्तूर के |
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