अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 
नूर
राकेश खण्डेलवाल

मेरी अँगनाई में मुस्कुराने लगे, वे सितारे जो अब तक रहे दूर के
दूज के, ईद के, चौदहवीं के सभी चाँद थे अंश बस आपके नूर के
ज़िन्दगी रागिनी की कलाई पकड़, एक मल्हार को गुनगुनाने लगी
आपकी उँगलियाँ छेड़ने लग पड़ीं तार जब से मेरे दिल के सन्तूर के

अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें