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05.03.2012
 
निगाहों के प्रश्न
राकेश खण्डेलवाल


बादलों में सँवरता हुआ कोई चेहरा
मुझको ले जाता है यादों की किसी वादी में
और सावन के मोतियों में मुझे
तेरी आँखें दिखाई देती हैं
मन पखेरू उड़ान भरता है
नीले नभ के विशाल दामन में
ढूँढता फिरता है बस वो ही जगह
जिस जगह साँझ तक सवेरे से

चाह के इन्द्रधनुष बनते हैं
कोई इक अक्स चाह का आकर
इसकी बाँहों में उतरता आये
तब ही धुँधलाये हुए खाकों में
कोई आकार उभरता आये
फिर निगाहों के प्रश्न उठते हैं
फिर न उत्तर कोई नज़र आता
साँझ ढलती है, मेरी गठरी का
एक दिन और खर्च हो जाता

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