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| 01.27.2008 |
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निद्रा आ उन्हें फिर भेड़ती है
राकेश खण्डेलवाल |
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खोलता हूँ नैन के पट, मैं तुम्हारे स्वप्न का स्वागत करूँगा
किन्तु बारम्बार निद्रा आ उन्हें फिर भेड़ती है जानता हूँ हो मेरे अहसास की अनुभूतियों में तुम हमेशा पर नहीं आकर उतरता चित्र कोई भी नयन में कर रहा महसूस मैं सान्निध्य पल पल पर तुम्हारा प्राण सरिते बन नहीं पाता मगर आकार आकर के सपन में हो विलग रहते नहीं हो मीत मुझसे एक पल के भी लिये तुम तुम मेरे अस्तित्व का आधार तो हो, स्वामिनी हो हैं जुड़े ये प्राण, धड़कन, साँस गतिक्रम एक तुम ही से सुनयने ज़िन्दगी के साज की सरगम तुम्हीं हो, रागिनी हो इसलिये मैं एक तुम को ही सदा आवाज़ देता हूँ विजन में प्राण की शहनाई को सुधि हर घड़ी आ छेड़ती है वे विगत के पल तुम्हारे चित्र हो सहयात्री चलते रहे है साथ मेरे आज मेरे सामने फिर से खड़े आकर अचानक हो गये हैं ये तुम्हारे रेशमी कुन्तल घटाओं में संवर कर कल घिर थे नील नभ पर आज फिर से कल्पना की बदरियों में नीर भरने लग गये हैं नैन में तिरती हुई परछाइयों में जो उभरते थे हजारों कुमकुमों से आस के वे दीप फिर से ज्योतिमय हो सज रहे बन कर दिवाली और वे पल जो सदा ही मौन उत्तर बन गये थे प्रश्न के जो आये थे मेरे अधर पर देखते हैं वे मुझे अब पास आकर हैं खड़े बन कर सवाली स्वप्न इक विश्वास का मंझधार के नाविक सरीखा टूटता मस्तूल थामे और धारा दूर तट पर से खड़ी होकर मुझे फिर टेरती है इस भटकती ज़िन्दगी का कौन सा पथ कौन मंज़िल कौन जाने भेद ये खुल पायेगा इसका नहीं अनुमान भी लग पा रहा है है कोई धुन, कोई स्वर है, कोई सरगम राग कोई, वाद्य कोई पर विदित होता नहीं है कौन इसको कौन सी पादान पर से गा रहा है हो रहा महसूस जो, जाना हुआ सा किन्तु थोड़ा सा अपरिचित भी लगे है थामता है उंगलियों को दूर से मेरी बिना कोई परस के और खुलते बन्द होते रात दिन के जो पड़े परदे त्रि-अंकी नाटकों पर कर रहे हैं चेतना के सब निमिष प्यासे मगर केवल दरस के फिर अचानक एक बोझिल सा कोई सन्दर्भ का टूटा हुआ टुकड़ा उठाये सान्द्र कोहरे में सनी एकाकियत आ कर मुझे फिर घेरती है |
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