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05.03.2012
 
नींद के साथ शतरंज
राकेश खण्डेलवाल


यूँ तो कुछ भी न था जिसके भ्रम में फँसी
कामना रात दिन छटपटाती रही
और पीपल की डाली पे बैठी हुई
एक बुलबुल पिया को बुलाती रही

गूँजती राह में पैंजनी की खनक
याकि गागर थकी एक सोई हुई
हों सहेली सी बतिया रही चूड़ियाँ
या कि तन्हा हो नथ एक खोई हुई
नैन के आँगनों में सपन बैठ कर
नींद के साथ शतरंज हों खेलते
और चुप इक किनारे खड़ी हो निशा
बीते दिवसों का भारी वजन झेलते

सबकी आँखों में जलते हुए प्रश्न के
ज़िन्दगी मौन उत्तर सुनाती रही

सृष्टि के थी संदेसे लिखे जा रही
इस धरा पर हलों की नुकीली कलम
एक ही है इबारत, कि दोहरा रहे
हम सभी जिसको अब तक जनम दर जनम
भोर बोझिल पलक से झगड़ती हुई
साँझ की जंग बढ़ती हुई नींद से
आस फूलों के रंगों में डूबी हुई
वक्त करता हुआ टुकड़े उम्मीद के

अपनी धुन में मगन, एक पर आस्था
रोज शिवलिंग पर जल चढ़ाती रही

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