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| 05.22.2009 |
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नहीं संभव रहा राकेश खण्डेलवाल |
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नहीं संभव रहा अब लौट कर उस द्वार तक जाना
गली जिसमें हमारे पाँव के उगते निशां हर पल वो पीपल, पात जिसके छाँव करते शीश बन आँचल कुँए की मेंड़ जिसने गागरें प्यासी भरीं अनगिन वो मंदिर द्वार पर जिसके कभी लगती नहीं आगल नहीं संभव रहा अब धुन्ध से उनका उभर आना दिये की लौ, खनकती घंटियाँ चौपाल की बातें वो बमलहरी की स्पर्धायें लिये संगीतमय रातें सुबह की आरती मंगल सिराना दीप नदिया में हज़ारों मन्नतों की बरगदों की शाख पर पाँतें नहीं संभव रहा साकार अब वह दृश्य कर पाना गली में टेसुआ गाती दशहरे की कोई टोली सँवरती सूत, कीकर, घूघरी से रंगमय होली रँगे रांगोलियों से वे तिवारे, आँगना, देहरी शहद डूबी वो मिश्री की डली जैसी मधुर बोली नहीं संभव रहा फिर से इन्हें अनुभूत कर पाना नहीं संभव रहा अब लौट कर उस गाँव में जाना |
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