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ISSN 2292-9754

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09.17.2014


मिली ही नहीं व्याकरण की गली

हम भटकते रहे काव्य के गाँव में
पर मिली ही नहीं व्याकरण की गली
आंजुरी में भरी शब्द की पंखुरी
संग उड़ा ले गई इक हवा मनचली

चाह थी कुंडली का पता कुछ चले
डोर परिचय की बाँधें नई छन्द से
मुक्तकों के महकते हुए बाग में
साँस भर जाये रसगीत की गंध से
सोरठे अंकुरित हो जहाँ पर रहे
मिल सकें अक्षरों को वही क्यारियाँ
ड्यौढ़ियों से सवैय्यों की मिलती हुई
हौं जहाँ पर कवित्तों की फुलवारियाँ

भोर उगती रही है जहाँ पद्य की
गद्य की सांझ जा मोड़ जिसके ढली
ढूँढ़ता हूँ वही व्याकरण की गली

गुनगुनाती रही एक कामायनी
जिस जगह फूल साकेत के थे खिले
सूर का सिन्धु उमड़ा निरन्तर बहा
बोल मीरा के थे भावना को मिले
मंत्र के बीज बोकर गई थी जहाँ
वाहिनी हंस की, बीन झंकार कर
मानसी गंग तुलसी प्रवाहित किये
राम का नाम बस एक उच्चार कर

मृग सी तृष्णा लिये मन भटकता रहा
होंठ पर प्यास उगती रही बस जली
पर मिली ही नहीं व्याकरण की गली

कोई नवगीत हो न सका पल्लवित
शब्द अनुशासनों में नहीं बँध सके
भाव बैसाखियों पर टिके रह गये
एक पग छन्द की ओर न चल सके
रागिनी, राग के प्रश्नपूरित नयन
भोर से साँझ तक ताकते रह गये
शब्द जो एक पल होंठ पर आ रुके
वे सभी मौन की धार में बह गये

और फिर पूर्णता के बिना रह गयी
आस जो एक मन में सदी से पली
क्योंकि मिल न सकी व्याकरण की गली


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