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| 06.13.2007 |
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मन व्यथित मेरे प्रवासी राकेश खण्डेलवाल |
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आज फिर इस धुन्ध में डूबी हुई स्मृति के किनारे
किसलिये तू आ गया है? ओढ़ कर बैठा उदासी मन व्यथित मेरे प्रवासी स्वप्न की चंचल पतंगों का अभी तक कौन धागा खींचता है? चीन्ह है पाया नहीं हर रात जागा पुष्प-शर सज्जित धनुष के छोर दोनों रिक्त पाये बस छलावों में उलझ कर रह गया रे तू अभागा किसलिये तू आस की कर ज्योति प्रज्वल है प्रतीक्षित जानता है ले रही है वर्त्तिका भी अब उबासी मन व्यथित मेरे प्रवासी बादलों की ओढ़नी को ओढ़कर आती बयारें द्वार पर आकर कई जो नाम रह रह कर पुकारें कोशिशें करता, कि उनकी खूँटियों पर टाँग चेहरे एक मादक स्पर्श के पल से पुन: सुधियाँ सँवारें किन्तु सीमा चाह की हर बार होकर रह गई है भोर के बुझते दिये की एक धुंधुआसी शिखा सी मन व्यथित मेरे प्रवासी काल की अविराम गति में चाहता ठहराव क्योंकर दूर कितना आ चुका है धार में दिन रात बह कर इस तिलिस्मी पेंच में कुछ देखना पीछे मना है सिर्फ़ चलना सामने जो पथ, उसी पर पाँव धर कर है असंभव जो उसी की आस में डूबा हुआ है जानता है, है नहीं संभावना जिसकी जरा सी मन व्यथित मेरे प्रवासी ढूँढ़ता सुबहो बनारस हर उगे दिन की डगर में साँझ अवधी हो सपन ये देखता है दोपहर में लपलपाती हर लपट में यज्ञ की स्वाहा तलाशे और बुनता मंत्र-ध्वनियाँ शोर की इस रहगुज़र में इन अँधेरी स्याह सुधियों में खुला इक पॄष्ठ कल का दीप्त सहसा कर गया है प्रीत की मधुरिम विभा सी मन व्यथित मेरे प्रवासी |
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