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| 07.06.2008 |
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क्या संभव इस बार राकेश खण्डेलवाल |
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पानी का बुलबुला बनाती, सारे स्वप्न भोर की थपकी
क्या संभव इस बार आँख का कोई तो सपना सच हो ले पल्लव सभी उड़ा ले जाती बहती हुई हवा पल भर में तट की सभी संपदा लहरें ले जातीं समेट कर, कर में चक्रवात के पथ में बचते चिन्ह शेष न निर्माणों के प्रत्यंचा से बन पाते हैं कब संबंध घने वाणों के ये सच है. हाँ पर ये भी तो सच है थके हुए पाखी को है उपलब्ध गगन की पूरी सीमा, यदि अपने पर तोले सीमा नहीं हुआ करती है, यों चाहत के विस्तारों की रह जाती है एक कहानी बनकर अक्सर अखबारों की सागर की हर इक सीपी में मोती नहीं मिला करता है उपवन का हर इक पौधा तो चन्दन नहीं हुआ करता है लेकिन फिर भी बून्द एक जो छिटकी हुई किसी ज्योति की आशान्वित होती है संभव है वह किरण नवेली होले महका करते हैं गुलदस्ते, अभिलाषा के साँझ सकारे आकांक्षाओं की चूनरिया लहराती है मन के द्वारे सतरंगे अबीर सी झिलमिल झिलमिल होती मधुर कल्पना अगली बार निराशा का हो शायद कोई भी विकल्प ना कागज़ पर खींची जाती है जो रेखायें बना योजना क्या संभव है दीवारों के बिना बना कोई घर हो ले |
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