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| 02.16.2009 |
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कहो पढ़ा क्या प्रियतम तुमने राकेश खण्डेलवाल |
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गिरिशृंगों के श्वेत पत्र पर सूरज की किरणों ने आकर
जो सन्देश उभारा उसको कहो पढ़ा क्या प्रियतम तुमने सागर की गहराई में से निकले मोती अक्षर बन कर और चले अँगड़ाई लेकर मेघदूत के रथ पर चढ़ कर पवन डाकिये की झोली में बैठे हुए शिखर तक आये फिर झोली से बाहर निकले और वादियों में छितराये जो अनुराग होंठ पर आया नहीं और न आँखों में ही अकस्मात हो गया समाहित वह शब्दों में आज सुनयने शिखरों से वादी के पथ पर खड़े हुए तरु देवदार के रखते हुए शाख के गुलदानों में कुछ अनुभव निखार के श्वेत शुभ्र हिम की फुहियों में बँधे प्रीत के कुछ सन्देसे पत्तों के प्याले में कण कण एक एक कर रख सहेजे ढाँपे हुए पाँव के चिन्हों को सौगंधों वाली चादर याद दिला पाई क्या तुमको बीते कल की चन्दन बदने चंचल बादल का इक टुकड़ा अठखेली करता वितान में गुपचुप पास क्षितज के जाकर, हौले से कुछ कहे कान में नये अर्थ देता सा मन के सम्बन्धों की परिभाषा को बांहों में भरता धरती को छू लेने की अभिलाषा को जो प्रतीक वह बिना शब्द के समझाने में लगा हुआ है क्या तुम उसको समझ सको हो, यह बतलाओ कला निमग्ने वादी की इक शांत झील में खिले कमल की पंखुड़ियों पर शबनम ने जो पाठ पढ़ाये मधुपों को, गिन उँगलियों पर ढाई अक्षर में सिमटीं वे शत शत कोटि कोटि गाथायें जिनको मधुर स्वरों में गातीं नभ के झूले चढ़ीं हवायें उन गाथाओं का तुमने क्या कोई अक्षर जीकर देखा या फिर किसी कथानक का तुम पात्र बने हो ! देखे सपने? |
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