| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 02.16.2009 |
|
जितने मिले धूप के टुकड़े
राकेश खण्डेलवाल |
|
समय आ गया एक बार फिर स्वप्न सँवारूँ वे, पलकों पर
बीते हुए बरस की, शामिल जो अब भी हैं, परछाईं में जिधर निगाहें उठें उधर ही दिखें उमड़ते हुए अँधेरे दोपहरी वाले वितान पर लगे हुए हैं तम के डेरे सूरज चन्दा और सितारे, लगा हुआ है ग्रहण सभी पर राहू केतु से गठबन्धन में निगले है दिशा सवेरे इस अँधियारे की मनमानी गये बरस के साथ खतम हो भरता हूँ मैं गुलमोहर के रंग भोर की अरुणाई में जो पथ चूमें कदम वहाँ पर घिरें न आकर कभी कुहासे पथ की धूल स्वयं ही आकर करती रहे राह उजियारी काँटों का विस्तार सिमट कर हो जाये पाँखुर गुलाब की चन्दन की महकों से संवरे खिलती हुई ह्रदय की क्यारी जितने मिले धूप के टुकड़े, सब को ले आया बटोर कर ताकि ज्योति के दीप बो सकूँ, नये वर्ष की अँगनाई में देता हूँ आवाज़ बहारों को मैं नगर चौक में आकर लौट सकें वे प्रतिध्वनियों के संग में अम्बर से टकरा कर और जलाये आँधी आकर दीपक फिर से अभिलाषा का सीपी तट पर लाकर सौंपे एक बार फिर से रत्नाकर नव पाथेय स्वयं ही देता रहे बुलावा संकल्पों को और नीड़ का आमंत्रन हो नित ही संध्या घिर आई में |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|