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| 03.16.2009 |
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जीवन के इस संधि पत्र पर
राकेश खण्डेलवाल |
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जीवन के इस संधि पत्र पर,साँसों ने धड़कन से मिलकर
जो हस्ताक्षर किये हुए थे, वे धुंधले हो गये अचानक नयनों की चौकी पर खींची गईं विराम की रेखायें थीं समझौता था नहीं अतिक्रमण अश्रु-सैनिकों का अब होगा मन की सीमाओं पर यादें कभी नहीं घुसपैठ करेंगीं गुप्तचरी से कोई सपना आँखों में दाखिल न होगा किन्तु न जाने किस ने करके उल्लंघन तोड़ी हैं शर्तें नये ढंग से लिखा जा रहा इस विराम का आज कथानक शान्ति-वार्ता के सारे ही आमंत्रण रह गये निरुत्तर "पता नहीं मालूम" लिये है लौटा पत्र निमंत्रण वाला किये फोन तो पता चला है नम्बर यह विच्छेद हो गया रिश्तेदारों के दरवाजे पर लटका था भारी ताला किसको भेजें इक विरोध का पत्र यही असमंजस भारी सन्धि पत्र की धाराओं का जिसने लिखा हुआ है मानक सौगन्धों की रक्षा परिषद ने सारे सम्बन्ध नकारे शीत युद्ध में लीन मिले सब, सूखे फूल किताबों वाले इतिहासों की गाथाओं ने चक्रव्यूह ही रचे निरन्तर हुए समन्वय वाले सारे स्वर बिल्कुल आड़े-चौताले उत्तरीय फिर से अनुबन्धन का कोई आ लहरा जाये दीप्तिमान करता आशा को संध्या भोर निशा यह स्थानक आठों याम अड़ी रहती है मन की कोई भावना हठ पर और नियंत्रण बिन्दु कहां हो ? नहीं चेतना सहमति देती सुधियाम तो बहाव की उंगली पकड़े चाह रही हैं चलना पर यथार्थ की चली हवायें नौका को उल्टा ही खेतीं पाठ शांति के पढ़ा सके जो आज पुन: जीवन में आकर आस बालती दीपक, आये पार्थसारथि, गौतम, नानक |
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