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05.03.2012
 
जाने क्यों लगता है
राकेश खण्डेलवाल

जाने क्यों लगता है तुमसे है मेरी पहचान पुरानी
यद्यिप हम तुम मिले नहीं हैं और न देखी कोई निशानी

पहली बार सुना था मैने नाम तुम्हारा तो जाने क्यों
लगा बजी है जलतरंग सी जैसे कोई उद्यानों में
दुल्हन के अधरों पर पहला पहला कोई शब्द खिला हो
या सरोद की अँगड़ाई हो घुली पपीहे की तानों में

टेरी हो, कालिन्दी के तट पर बाँसुरिया हो दीवानी
जाने क्यों लगता है तुमसे है मेरी पहचान पुरानी

चित्र वीथिका की दीवारों पर जितने भी चित्र लगे हैं
उनमें सबमें अंकित लगता बनी प्रेरणा छवि तुम्हारी
भित्ति चित्र हों मूर्त्तिशिल्प हो, भले अजन्ता हो, मीनाक्षी
सबमें उभरी हुई कलाकृति करती जयजयकार तुम्हारी

चित्र तुम्हारे बना तूलिका, होने लगती है अभिमानी
जाने क्यों लगता है तुमसे है मेरी पहचान पुरानी

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