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05.03.2012
 
इसीलिये मैं मौन रह गया
राकेश खण्डेलवाल


एक तुम्हारा प्रश्न अधूरा, दूजे उत्तर जटिल बहुत था
तीजे रुंधी कंठ की वाणी, इसीलिये मैं मौन रह गया

बचपन की पहली सीढ़ी से यौवन की अंतिम पादानें
मंदिर की आरती से लेकर मस्जिद से उठती आजानें
गिरजे की घंटी के सुर में घुलती हुई शंख की गूँजें
थीं हमको आवाज़ लगातीं हम आकर उनको पहचानें

लेकिन पिया घुटी में जो था, उसका कुछ प्रभाव ऐसा था
परछाईं में रहे उलझते, और सत्य हो गौण रह गया

लालायित हम रहे हमेशा, आशीषों के चन्द्रहार के
और अपेक्षित रहे बाग के दिन सारे ही हों बहार के
स्वर्ण-पत्र पर भाग्य लिखेगा सदा, हमारा भाग्य नियंता
और कामनायें ढूँढ़ेंगी, रह रह कर हमको पुकार के

जब ललाट पर लगीं उँगलियाँ, हमने सोचा राजतिलक है
देखा दर्पण में तो पाया, केवल लगा डिठौन रह गया

सदा शीर्ष के इर्द गिर्द ही रहीं भटकतीं अभिलाषायें
और खोजतीं केवल वे स्वर, जो श्रवनामॄत मंत्र सुनायें
पक्षधार हो द्रोण, कर सके, एकलव्य हर एक नियंत्रित
और दिशायें विजयश्री की धवल पताकायें फ़हरायें

जीवन के इस बीजगणित के लेकिन समीकरण सब उलझे
जो चाहा था पूरा हो ले, वो ही आधा-पौन रह गया

जहाँ लिया विश्राम काल की गति ने एक निमिष को रुककर
थमे हुए हैं जीवन के पल, अब तक उसी एक बिन्दु पर
राजसभा में ज्यों लंका की, पाँव अड़ाया हो अंगद ने
या इक राजकुँवर अटका हो, चन्दा को पाने के हठ पर

बारह बरस बदल देते हैं, मिट्टी की भी जर्जर काया
ढूँढ़ रहा हूँ कोई बताये, ये सब बातें कौन कह गया?

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